UPBIL/2018/70352

संवेदन बनाम गैर-संवेदन रिश्तों के मध्य एक राजनेता का अंत

  SD DESUZA; PANJI
गोवा के नए मुख्यमंत्री प्रमोद सावंत आज विधानसभा में बहुमत परीक्षण का सामना करेंगे. उससे पहले भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने अपने विधायकों को एक पांच सितारा होटल में भेज दिया है. यह सूत्रों के हवाले से यह खबर आयी है.
मनोहर पर्रिकर और भाजपा विधायक फ्रांसिज डिसूजा के निधन व दो कांग्रेसी विधायकों के इस्तीफे के चलते 40 सदस्यों वाली गोवा विधानसभा में अब 36 सदस्य रह गए हैं. भाजपा के नेतृत्व वाली सरकार ने कहा है कि उसे 21 विधायकों का समर्थन है. इनमें उसके अपने 12 विधायकों के अलावा तीन-तीन विधायक गोवा फॉरवर्ड पार्टी (जीएफपी)महाराष्ट्र गोमंतक पार्टी (जीएमपी) से और तीन ही निर्दलीय के रूप में शामिल हैं.
यह कार्य बीजेपी मनोहर परिकर के जीवित रहते ही कर सकती थी. अब इसमें यह सफाई देना कि पर्रिकर बीजेपी के प्रिय नेतृत्व वाले व्यक्तित्व थे यह उत्तरदायी जवाब नहीं कहा जा सकता इसे प्रश्नवाचक ही माना जायेगा जिसे बीजेपी देना नहीं चाहेगी.
सच परिकर समर्पित थे;वफादार थे, किन्तु पार्टी के बाहुबली जिन्हे चिन्हित नहीं किया जा सकता है उनके पास निश्चय ही संवेदना का अभाव है यह कहना गलत नहीं है.
इस तर्क को इस बात से भी समझने की कोशिश की जाय कि बीजेपी के शीर्ष नेता में अटल बिहारी बाजपेई 2014 में जीवित थे और देश-दुनिया की बड़ी जानी पहचानी हस्तियों में थे एवं बीजेपी में उनके सम्मान का आकलन इस बात से भी लगता है कि 36 कलश में रखी हुई अटल बिहारी वाजपेयी की अस्थियों को उनकी मृत्यु के बाद नदियों में प्रवाहित किया गयाउनमें मध्य प्रदेश की  नर्मदाक्षिप्राताप्तीचम्बलसोनबेतवापार्वतीसिंधपेंच और केन शामिल हैं.
इसे प्रवाहित करने से पहले बीजेपी ने इनके सम्मान में कलश यात्रा का आयोजन भी किया। अब देखना यह है कि बाजपेई जी को बीजेपी ने दोबारा प्रधानमंत्री क्यों नहीं बनाया; कारण जो भी रहा है  मानवीय परिस्थितियां परिकर एवं पूर्व प्रधान मंत्री स्वर्गीय अटल बिहारी बाजपाई की एक जैसी थी. दोनों परिस्थितियों में चरित्र ने कैसा महसूस किया और पार्टी के सेंसर ने कितना उनपर रहम किया यह बात दुनिया के सामने है.
इस तरह की संवेदनहीन परिस्थितियों के वातावरण में आगे का कार्य जारी है तो क्या अब लोकतंत्र परिथितिकी से इतर अंको द्वारा नियंत्रित किया जायेगा।                  
खबर के मुताबिक गोवा फॉरवर्ड पार्टी (जीएफपी)महाराष्ट्र गोमंतक पार्टी (जीएमपी) और निर्दलीय विधायकों को भाजपा के खेमे में लाने के लिए खुद पार्टी अध्यक्ष अमित शाह को काफी मशक्कत करनी पड़ी. बताया जा रहा है कि जीएमपी के सुदिन धवालिकर और जीएफपी के विजय सरदेसाई पहले मुख्यमंत्री का पद मांग रहे थे. हालांकि अब ये दोनों उप-मुख्यमंत्री बनने को राजी हो गए हैं. इसे लेकर सरदेसाई ने एनडीटीवी से कहा, ‘हम सरकार में होने के नाते चाहते हैं कि यह बची रहे. मैं इतना जरूरी कहूंगा कि यह एक नई शुरुआत है. आप कह नहीं सकते कि भविष्य में क्या होगा.
मनोहर पर्रिकर  का गोवा में जनता के मध्य संवेदनशील संबंध था  इसे यूँ  भी समझा जा सकता है कि  गोवा में कांग्रेस से भी कम सीटें होने के बावजूद भाजपा की सरकार मनोहर पर्रिकर के नाम पर ही बनी थी.
जो भी निर्दलीय विधायक और छोटी पार्टियों के विधायक भाजपा के साथ आए, उनमें से ज्यादातर की शर्त यही थी कि पर्रिकर को मुख्यमंत्री बनाया जाए. 
गोवा में भाजपा सरकार बनवाने में सबसे सक्रिय भूमिका निभाने वाले केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी ने सार्वजनिक तौर पर माना था कि मनोहर पर्रिकर को मुख्यमंत्री बनाने की शर्त सबसे पहले विजय सरदेसाई ने रखी और इसके बाद कुछ दूसरे विधायकों ने भी यही शर्त रखी. इन्हीं विधायकों के दबाव में मनोहर पर्रिकर से केंद्र सरकार में रक्षा मंत्री का पद छुड़वाकर उन्हें वापस गोवा भेजा गया था.
2014 में मनोहर पर्रिकर से गोवा के मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दिलाकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उन्हें अपने मंत्रिमंडल में शामिल किया था. उस वक्त यह बात आई थी कि प्रधानमंत्री अपनी शुरुआती टीम में ही उनको शामिल कर उन्हें दिल्ली लाना चाह रहे थे. यानी मई 2014 में. लेकिन उस वक्त मनोहर पर्रिकर तैयार नहीं हुए. लेकिन जब नरेंद्र मोदी ने अपने मंत्रिमंडल में पहली बार फेरबदल किया तो पर्रिकर केंद्र सरकार में आ गए और उनकी जगह गोवा का मुख्यमंत्री लक्ष्मीकांत पारसेकर को बनाया गया.
असल में जैसे हालात थे उनमें गोवा में मनोहर पर्रिकर का कोई ऐसा विकल्प नहीं था जो हर पक्ष को स्वीकार्य हो. केंद्रीय मंत्री श्रीपद नाइक को मुख्यमंत्री बनाने को लेकर कुछ सहयोगियों को दिक्कत थी. वहीं नाइक के आने के बाद किसी विधायक से इस्तीफा दिलाकर उन्हें छह महीने के अंदर विधानसभा के लिए निर्वाचित कराने का भी झंझट था. सूत्रों के मुताबिक 13 विधायकों वाली भाजपा लोकसभा चुनाव से पहले ऐसा कोई जोखिम लेने को तैयार नहीं थी.


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