UPBIL/2018/70352

बाल कल्याण सिमिति ने स्ट्रीट चिल्ड्रन को बचाव प्रशिक्षण दिया


स्ट्रीट चिल्ड्रन को अगर प्रशिक्षण दिया जाये तो वो क्या नहीं कर सकते ऐसा एक जलवा देखने को मिल रहा है, लखनऊ में सहभागी शिक्षा केंद्र परिसर में जहाँ समाज सेवी चेतना संस्था और एचसीएल फाउंडेसन के संयुक्त तत्वाधान में लगभग 70 ऐसे बच्चे जो की सड़क एवं झुगियो में जीवन यापन करते है, उनको एक अनोखा प्रशिक्षण दिया जा रहा है। इस प्रशिक्षण में बाल अधिकार, शोषण से बचना और विभिन स्टेक होल्डर्स की कार्य प्रणाली के बारे में बताया जा रहा है,
इस प्रशिक्षण में बताया जा रहा है कि विशेष किशोर पुलिस इकाई कैसे काम करती है, बाल कल्याण सिमिति, चाइल्ड लाइन और बाल आयोग बच्चो की कैसे मदद करते है।
संस्था के निदेशक श्री संजय गुप्ता ने बताया कि बच्चो के साथ प्रशिक्षण करने के लिए हमें बच्चो के स्तर पर आना पड़ता है , इस लिए प्रशिक्षण में खेलकूद, नाटक ,सेमिलेसन आदि करके बच्चो का उत्साह बढ़ाया जा रहा है।
विकास नगर में रहने बाली बच्चो की लीडर काजल का कहना है की यहाँ पर मेरे को जानकारी मिली है अगर कोई मेरे साथ बतमीजी करे तो कैसे चाइल्ड लाइन, बाल कल्याण समिति से मदद लेनी है, कहाँ और कैसे पुलिस का प्रयोग करना है। 11 साल के रवि ने वहाँ उपस्थित सभी लोगो का अपने सुन्दर डांस से मन मोह लिया।
इस कार्यक्रम में मुख्य अतिथि धीरेन्द्र सिंह सचान (spl Secy u.p. Gov ),DPO और एचसीएल फाउंडेसनसे सिमी , अरुणिमा अदि लोग उपस्तिथ रहे।

मर्द को दर्द नहीं होता रीव्यू: ज़रूर देखें!

मर्द को दर्द नहीं होता रीव्यू: ज़रूर देखें!

mard ko dard nahi hota
जब मैंने पिछले साल एक फिल्म फेस्टिवल में पहली बार मर्द को दर्द नहीं होता  देखी, तो मुझे माटुंगा के एक फिल्म दीवाने के पॉप कल्चर अंदाज़ में छुपे नासमझी भरे अतीत को देखने में काफ़ी मज़ा आया।
फिर मैंने इसे दुबारा देखा, और मुझे लगा कि सचमुच इसे ही कहते हैं फिल्म मेकिंग की बिल्कुल ओरिजिनल सोच।
डायरेक्टर वासन बाला का दिमाग़ सपनों की एक दुनिया है, जहाँ बचपन की सुनहरी यादें एक अद्भुत वास्तविकता के साथ सामने आती हैं।
वो हमें ऐसी चीज़ें दिखाते हैं, जो पहले भी हमारे बीच थीं, लेकिन उन्हें दिखाने का तरीका इतना अनोखा होता है, कि उस चीज़ को देखने का हमारा नज़रिया ही बदल जाता है।
साथ ही वो कहानी के साथ जाने वाला मस्ती भरा, मज़ेदार म्यूज़िक पसंद करते हैं।
हालांकि मर्द को दर्द नहीं होता  में कई फिल्मी पहलुओं के लिये सम्मान जताया गया है लेकिन एक फैनबॉय की कलाकारी के रूप में इन्हें फिल्म में बेहद मज़ेदार और हास्यपूर्ण तरीके से दिखाया गया है। हम सभी सिनेमा प्रेमी जानते हैं कि फिल्मों का शौक ज़िंदग़ी के शुरुआती दिनों में शुरू होता है, और ज़िंदग़ी भर रहता है।
बच्चन हो या ब्रूस ली, एक फिल्म-दीवाने का अपने फिल्म मसीहा के लिये विश्वास अटूट होता है।
बाला ने इसी अटूट विश्वास को एक मर्द की कहानी में दिखाया है, जो हर बार चोट लगने पर 'आउच' की आवाज़ निकालता है, क्योंकि उसे एक पुरानी बीमारी है - उसे लगता है उसे दर्द नहीं होता।

यह एक कहानी बयाँ करने वाला शीर्षक है और मनमोहन देसाई की मर्द में बिग बी के जाने-माने डायलॉग का ख़ूबसूरत इस्तेमाल है।
जब हम सूर्या (अभिमन्यु दसानी) की पहली झलक देखते हैं, तो मुंबई के सबर्ब्स का ये लड़का स्लो मोशन में उसकी तरफ पागल सांड की तरह बढ़ते गुंडों से अकेला लड़ता हुआ दिखाई देता है।
न्यूकमर अभिमन्यु अपने भीतर भरी ज़िंदादिली के साथ-साथ नयेपन और सादग़ी की एक ख़ूबसूरत झलक देते हैं।
स्पोर्टिंग मरून ऐडिडास और ब्लू ऑनिट्सुका टाइगर शूज़ के साथ एक फैशनेबल पहली झलक के बीच चिरंजीवी 1990 के दशक के मशहूर गाने के लिये तैयार होते दिखाई देते हैं। रजनीकांत और कमल हासन भी आते हैं और अंजाने में फैन थ्योरीज़ के बारे में मज़ेदार बातें बताते हैं।
स्कूल के लड़के सूर्या के सीन्स में पुरानी फिल्मी झलकियों की कोई कमी नहीं है, जो स्टीमपंक पायलट जैसे कपड़े पहनता है और हाइड्रेशन बैकपैक लेकर चलता है, गोविंदा और चंकी पांडे की फिल्मों की लड़ाई के नारे लगाता है, अपने खतरनाक ज्योमेट्री बॉक्स में विध्वंसक हथियार रखता है और बचपन में एक लड़की से दोस्ती करता है, जिससे उसका धर्म और उनके पिता उन्हें अलग कर देते हैं।
इस अनोखी बीमारी के पीछे चलती कहानी भले ही उसे सुपरहीरो न बना पाये, लेकिन ज़्यादातर मार्शल आर्ट्स मूवीज़ की वीएचएस टेप्स देख-देख कर उसमें जाँबाज़ी भर गयी है और वो खुद को लोगों का रक्षक मानने लगा है।
फिल्मों से दूर रहना उसके लिये क्रिप्टोनाइट की तरह है, लेकिन उसके चिंतित पिता जब उसपर लगाम लगाते हैं तो उसकी पीटर पैन वाली उत्सुकता घटने की जगह और बढ़ जाती है।
सूर्या के आजोबा (महेश मांजरेकर का बहुत ही प्यारा किरदार) का उदार पालन-पोषण उसे हर चीज़ सिखाता है, उसके लड़ाकू सपनों (असभ्य कोड वर्ड्स में) से लेकर लड़कपन की चाह (सहे-ली वाले सुझावों में) तक, उनके बीच की बातचीत मर्द को दर्द नहीं होता  में मस्ती का नया रस घोल देती है।
कहानी और भी मज़ेदार हो जाती है जब सुप्री के रूप में राधिका मदन फ्रेम में आती हैं।
नयी और पुरानी नखरेवाली  की तर्ज पर दिया गया उसका परिचय उसके गुस्सैल स्वभाव को बख़ूबी बयाँ करता है, जिसकी झलक वो छेड़खानी करने आये कुछ गुंडों की पिटाई करके देती है और सूर्या के साथ-साथ दर्शक भी हक्के-बक्के रह जाते हैं।
वह सीन बड़ा ही प्यारा है जिसमें वो बेहद खुशी के साथ बताती है कि खुजली करने में कितना मज़ा आता है।
बचपन के बिछड़े दोस्तों के जवानी में दुबारा मिलने की इस कहानी में मेलोड्रामा का न होना बाला के ख़ास अंदाज़ की झलक देता है।
ऐसा नहीं है कि मर्द  साहस दिखाने से दूर भागता है। बल्कि मर्द तो अपनी बीमारियों, कमज़ोरियों, कमियों को मानता है और इन सभी को दूर करके बदलाव लाने के लिये तैयार रहता है।
जैसे मदन एक जिज्ञासु विरोधाभास है।
गलत काम करने वालों की हड्डी-पसली एक करने में माहिर एक कराटे एक्सपर्ट, जो अपनी बीमार माँ के इलाज के लिये अपने एनआरआइ आशिक के बर्ताव को झेलती है।
मैं कुछ भी नहीं हूं, एक दिल छू लेने वाले सीन में वो अपनी माँ (गंभीर पल को संजीदग़ी से अदा करती लवलीन मिश्रा) से कहती है।
लेकिन वो है, और यह बात मणि को पता है।
गुलशन दवैया की एक पैर वाली कराटे इन्स्ट्रक्टर और उसकी बदमाश जुड़वाँ बहन जिमी मर्द को दर्द नहीं होता  के सबसे बड़े ट्रम्प कार्ड हैं। दोनों पर बाला का पूरा ध्यान उनकी हरफनमौला काबिलियत के साथ-साथ अपने किरदारों के लिये ऐक्टर के भीतर से सही हाव-भाव को बाहर लाने की क्षमता को दिखाता है, जो आपको डायरेक्टर के रूप में उनकी पहली फिल्म पेडलर्स  में भी दिखाई देता, अगर वह फिल्म रिलीज़ हो पाती।
एस पी बालासुब्रमण्यम के प्लेबैक के अनोखे अंदाज़ के साथ मणि और जिम्मी के बीच की दुश्मनी की शुरुआत के पीछे की धमाकेदार कहानी मज़ेदार तरीके से दिखाई गयी है।
करन कुलकर्णी के गाने चिल्लाहट की तरह हैं, और फिल्म के पूरे 137 मिनट अलग-अलग भावनाओं के साथ गूंजते रहते हैं।
बाला ने एक इतनी अजीबोग़रीब, लेकिन बारीकी से भरी दुनिया बनाई है, जो शायद ही हमने पहले कभी देखी हो (हीरो को विलेन का पता मांगते हमने पिछली बार कब देखा था?)
दो बहनों के बीच बढ़ती दुश्मनी की दीवार हो, रीडेवलपमेंट के लिये अधूरी छोडी गयी इमारत पर मिलने वाले दोस्त हों, एक सिक्योरिटी सर्विसेज़ की इमारत के भीतर हँसाने वाला ऐक्शन सेट पीस हो, जिसके बुज़ुर्ग रखवाले मामा एमटीवी वाले दिनों की याद दिलाते हों या फिर फार्ट ज्ञान से शुरू होने वाला एक अनोखा रॉयल रम्बल हो, मर्द को दर्द नहीं होता  में हर कदम पर आपको सच और सपनों का संगम दिखाई देता है।
वासन बाला ने पूरे दिल से इसे बनाया है।
लोग सीढ़ियों से फँस कर गिर रहे हैं, गाड़ियों से टकरा रहे हैं, अपनी हथेलियाँ काट रहे हैं, होंठ छिल रहे हैं, खौलता पानी पी रहे हैं, लेकिन दर्द आपको ज़रूर दिखाई देगा।
और इस बात को फिल्म बनाने वाले से बेहतर कौन जानता है।
जैसा कि चिरंजीवी ने उस फ़्लैशबैक में कहा था, 'इट्स अ चैलेंज!

संवेदन बनाम गैर-संवेदन रिश्तों के मध्य एक राजनेता का अंत

  SD DESUZA; PANJI
गोवा के नए मुख्यमंत्री प्रमोद सावंत आज विधानसभा में बहुमत परीक्षण का सामना करेंगे. उससे पहले भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने अपने विधायकों को एक पांच सितारा होटल में भेज दिया है. यह सूत्रों के हवाले से यह खबर आयी है.
मनोहर पर्रिकर और भाजपा विधायक फ्रांसिज डिसूजा के निधन व दो कांग्रेसी विधायकों के इस्तीफे के चलते 40 सदस्यों वाली गोवा विधानसभा में अब 36 सदस्य रह गए हैं. भाजपा के नेतृत्व वाली सरकार ने कहा है कि उसे 21 विधायकों का समर्थन है. इनमें उसके अपने 12 विधायकों के अलावा तीन-तीन विधायक गोवा फॉरवर्ड पार्टी (जीएफपी)महाराष्ट्र गोमंतक पार्टी (जीएमपी) से और तीन ही निर्दलीय के रूप में शामिल हैं.
यह कार्य बीजेपी मनोहर परिकर के जीवित रहते ही कर सकती थी. अब इसमें यह सफाई देना कि पर्रिकर बीजेपी के प्रिय नेतृत्व वाले व्यक्तित्व थे यह उत्तरदायी जवाब नहीं कहा जा सकता इसे प्रश्नवाचक ही माना जायेगा जिसे बीजेपी देना नहीं चाहेगी.
सच परिकर समर्पित थे;वफादार थे, किन्तु पार्टी के बाहुबली जिन्हे चिन्हित नहीं किया जा सकता है उनके पास निश्चय ही संवेदना का अभाव है यह कहना गलत नहीं है.
इस तर्क को इस बात से भी समझने की कोशिश की जाय कि बीजेपी के शीर्ष नेता में अटल बिहारी बाजपेई 2014 में जीवित थे और देश-दुनिया की बड़ी जानी पहचानी हस्तियों में थे एवं बीजेपी में उनके सम्मान का आकलन इस बात से भी लगता है कि 36 कलश में रखी हुई अटल बिहारी वाजपेयी की अस्थियों को उनकी मृत्यु के बाद नदियों में प्रवाहित किया गयाउनमें मध्य प्रदेश की  नर्मदाक्षिप्राताप्तीचम्बलसोनबेतवापार्वतीसिंधपेंच और केन शामिल हैं.
इसे प्रवाहित करने से पहले बीजेपी ने इनके सम्मान में कलश यात्रा का आयोजन भी किया। अब देखना यह है कि बाजपेई जी को बीजेपी ने दोबारा प्रधानमंत्री क्यों नहीं बनाया; कारण जो भी रहा है  मानवीय परिस्थितियां परिकर एवं पूर्व प्रधान मंत्री स्वर्गीय अटल बिहारी बाजपाई की एक जैसी थी. दोनों परिस्थितियों में चरित्र ने कैसा महसूस किया और पार्टी के सेंसर ने कितना उनपर रहम किया यह बात दुनिया के सामने है.
इस तरह की संवेदनहीन परिस्थितियों के वातावरण में आगे का कार्य जारी है तो क्या अब लोकतंत्र परिथितिकी से इतर अंको द्वारा नियंत्रित किया जायेगा।                  
खबर के मुताबिक गोवा फॉरवर्ड पार्टी (जीएफपी)महाराष्ट्र गोमंतक पार्टी (जीएमपी) और निर्दलीय विधायकों को भाजपा के खेमे में लाने के लिए खुद पार्टी अध्यक्ष अमित शाह को काफी मशक्कत करनी पड़ी. बताया जा रहा है कि जीएमपी के सुदिन धवालिकर और जीएफपी के विजय सरदेसाई पहले मुख्यमंत्री का पद मांग रहे थे. हालांकि अब ये दोनों उप-मुख्यमंत्री बनने को राजी हो गए हैं. इसे लेकर सरदेसाई ने एनडीटीवी से कहा, ‘हम सरकार में होने के नाते चाहते हैं कि यह बची रहे. मैं इतना जरूरी कहूंगा कि यह एक नई शुरुआत है. आप कह नहीं सकते कि भविष्य में क्या होगा.
मनोहर पर्रिकर  का गोवा में जनता के मध्य संवेदनशील संबंध था  इसे यूँ  भी समझा जा सकता है कि  गोवा में कांग्रेस से भी कम सीटें होने के बावजूद भाजपा की सरकार मनोहर पर्रिकर के नाम पर ही बनी थी.
जो भी निर्दलीय विधायक और छोटी पार्टियों के विधायक भाजपा के साथ आए, उनमें से ज्यादातर की शर्त यही थी कि पर्रिकर को मुख्यमंत्री बनाया जाए. 
गोवा में भाजपा सरकार बनवाने में सबसे सक्रिय भूमिका निभाने वाले केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी ने सार्वजनिक तौर पर माना था कि मनोहर पर्रिकर को मुख्यमंत्री बनाने की शर्त सबसे पहले विजय सरदेसाई ने रखी और इसके बाद कुछ दूसरे विधायकों ने भी यही शर्त रखी. इन्हीं विधायकों के दबाव में मनोहर पर्रिकर से केंद्र सरकार में रक्षा मंत्री का पद छुड़वाकर उन्हें वापस गोवा भेजा गया था.
2014 में मनोहर पर्रिकर से गोवा के मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दिलाकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उन्हें अपने मंत्रिमंडल में शामिल किया था. उस वक्त यह बात आई थी कि प्रधानमंत्री अपनी शुरुआती टीम में ही उनको शामिल कर उन्हें दिल्ली लाना चाह रहे थे. यानी मई 2014 में. लेकिन उस वक्त मनोहर पर्रिकर तैयार नहीं हुए. लेकिन जब नरेंद्र मोदी ने अपने मंत्रिमंडल में पहली बार फेरबदल किया तो पर्रिकर केंद्र सरकार में आ गए और उनकी जगह गोवा का मुख्यमंत्री लक्ष्मीकांत पारसेकर को बनाया गया.
असल में जैसे हालात थे उनमें गोवा में मनोहर पर्रिकर का कोई ऐसा विकल्प नहीं था जो हर पक्ष को स्वीकार्य हो. केंद्रीय मंत्री श्रीपद नाइक को मुख्यमंत्री बनाने को लेकर कुछ सहयोगियों को दिक्कत थी. वहीं नाइक के आने के बाद किसी विधायक से इस्तीफा दिलाकर उन्हें छह महीने के अंदर विधानसभा के लिए निर्वाचित कराने का भी झंझट था. सूत्रों के मुताबिक 13 विधायकों वाली भाजपा लोकसभा चुनाव से पहले ऐसा कोई जोखिम लेने को तैयार नहीं थी.