UPBIL/2018/70352

मुकर रहे हो मंत्री जी की बजट कविता



सत्ता मद में पाप किये जो उनके बोझ उठाने होंगे।
उन्नीस के इस महाकुंभ में तुमको गोते खाने होंगे।।

लोग कह रहे हैं मंत्री जी, कुंभ नहा कर आए हैं।
शायद तन धोया है अपना हृदय नहीं धो पाए हैं।।
भ्रमित कर रहे हैं जनता को या खुद में भरमाए हैं।
फिर से भाषण,  फिर आश्वासन,  फिर जुमले भर लाए हैं ।।

समझ गयी है तुमको जनता,  अबकी होश ठिकाने होंगे ।
उन्नीस के इस महाकुंभ में तुमको गोते खाने होंगे ।।

संविधान मे समाजवादी प्रस्तावना कराह रही है।
और पंथनिर्पेक्ष राष्ट्र की संकल्पना कराह रही है।।
अनुच्छेद चौदह का जी भर न्यूनीकरण किया है तुमने,
फिर भी यह सरकार अनैतिक बल से बजट सराह रही है।।

संविधान से खेल खेलने के अब सबक सिखाने होंगे ।
उन्नीस के इस महाकुंभ में तुमको गोते खाने होंगे।।

सत्ता सुख पाकर, दिन पर दिन, निखर रहे हो मंत्री जी।
अहंकार में डूबे या बेखबर रहे हो मंत्री जी।।
पूछ रही है युवा शक्ति,  मेरे सपनो का क्या होगा ?
रोजगार वाले वादे से मुकर रहे हो मंत्री जी ।।

इस बेकारी की पीड़ा के निश्चित मुल्य चुकाने होंगे ।
उन्नीस के इस महाकुंभ में तुमको गोते खाने होंगे।।
..................... अजय कुमार 'लल्‍लू'



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