UPBIL/2018/70352

क्या कांग्रेस अब मान चुकी है कि आगामी लोकसभा चुनाव दो राष्ट्रीय पार्टियों का रण है?


पी भटट; पोलिटिकल अन्वेषक  
प्रियंका गांधी के कांग्रेस महासचिव और पूर्वी उत्तर प्रदेश का पार्टी प्रभारी बनने के बाद से भाजपा की तरफ से तरह-तरह की प्रतिक्रियाएं आई हैं. ज्यादातर प्रतिक्रियाओं में भाजपा नेताओं ने प्रियंका गांधी को खारिज ही किया है. उनका कहना है कि मीडिया प्रियंका गांधी को बढ़ा-चढ़ाकर पेश कर रहा है जबकि जमीनी स्तर पर उनको लेकर लोगों में उत्साह का कोई माहौल नहीं है.
जमीनी स्तर पर उत्साह की बात को कहाँ तक सही माना जायेगा यह तो भविष्य गर्त में छुपा हैकिन्तु यह भी छुपा है की प्रियंका के महासचिव बनने से पूर्व एवं पश्चात भाजपा को कितना नुकसान हो रहा था कितना फायदा होगा एक विचारणीय विषय है. 
सपा बसपा के गठबंधन के बाद एवं प्रियंका के महासचिव बनने तक के दौरान भाजपा एवं सपा बसपा के बीच कैसा राजनीतिक माहौल था पर भी  नजर डालना होगा।
यदि देखा जाय तो सभी पार्टियों के नेता भाजपा के हिन्दू खेल की हवा का रुख बदलने में कहीं कोई कसर नहीं छोड़ना चाहते है जातिगत समीकरण देखा जाय तो सपा-बसपा गठबंधन वोट के मामले में अधिक मजबूत दिखता है किन्तु यह क्षेत्रीय पार्टी है इनका संक्रमण उत्तर प्रदेश तक सीमित है और इस गठबंधन के वोट की चिंता भाजपा एवं कांग्रेस को रही थी किन्तु मामला यह है किसे ज्यादाकिसे कम. 
कांग्रेस उत्तर प्रदेश में प्रियंका बाद वोट के लिए सभी दलों को दोहरा चोट दे सकती है -- कम से कम इसका प्रभाव किस राजनितिक दल को झेलना है भविष्य तय करेगाअब भाजपा को अपनी जमीनी विकास की गाथाजो उनके कार्यकर्ताओं एवं सरकरी दस्तावेजों की सच्चाई पर निर्भर हैउसी के भरोसे ग्रामीण वोट को ले सकेगी।       
अब देखा जाए तो 1989 के बाद से कांग्रेस का सूर्य यू पी में धीरे-धीरे अस्त  होता रहातो जो भी अंजाम उप्र में कांग्रेस का होगा उसके लिए कांग्रेस को नुकसान का कोई ज्यादा फर्क नहीं पड़ता,पर सपा-बसपा एवं बीजेपी को नुकसान होता है तो भारतीय राजनीति  पर इसका क्या असर होगा अंदाजा लगाया जा सकता है.               
लेकिन भाजपा के पूर्वी उत्तर प्रदेश के अलावा राष्ट्रीय नेताओं से अनौपचारिक बातचीत से पता चलता है कि भाजपा नेता आधिकारिक तौर पर चाहे जो भी बोल रहे हों लेकिन अंदरखाने दूसरी ही स्थिति है. प्रियंका गांधी को लेकर पहले भी भाजपा में एक भय का माहौल रहा है. पार्टी के वरिष्ठ नेताओं को यह पहले भी लगता था कि अगर प्रियंका राजनीति में सक्रिय होती हैं तो वे भाजपा को नुकसान पहुंचा सकती हैं. पार्टी में यह माहौल खास तौर पर उस दौर में था जब नरेंद्र मोदी पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व में नहीं थे और गुजरात के मुख्यमंत्री के तौर पर काम कर रहे थे.
हैरानी की बात यह है कि अब भी केंद्र में सत्ताधारी भाजपा में यही माहौल है. प्रियंका गांधी से भाजपा नेताओं को कई तरह का भय सता रहा है. पार्टी के एक वरिष्ठ नेता कहते हैं, ‘भाजपा के कई बड़े नेताओं को यह लगता है कि प्रियंका गांधी की राजनीतिक सक्रियता से राज्यों में पहले से मजबूत क्षेत्रीय दलों को कम नुकसान होगा. क्योंकि ये क्षेत्रीय दल वहां के स्थानीय मुद्दों पर वहां के अपने क्षत्रपों के नेतृत्व में काम कर रहे हैं. लेकिन जहां तक राष्ट्रीय पार्टी का सवाल है तो प्रियंका गांधी कई राज्यों में भाजपा को नुकसान पहुंचा सकती है.’ वे आगे जोड़ते हैं, ‘हालांकि इसके लिए प्रियंका को नरेंद्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के मुकाबले एक ऐसा राजनीतिक विमर्श पैदा करना होगा जो राहुल गांधी की राजनीतिक शैली से आगे जाता हो. अगर वे यह करने में कामयाब हो जाती हैं तो भाजपा को उनकी सक्रियता काफी नुकसान पहुंचा सकती है.
भाजपा में लंबे समय से विभिन्न सांगठनिक जिम्मेदारियों को निभा रहे एक नेता कहते हैं, ‘नरेंद्र मोदी और अमित शाह के नेतृत्व वाली भाजपा ने कांग्रेस पर आक्रमण की ज्यादा सीधी और आक्रामक शैली को अपनाया. पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को मौन मोहन’ कहासोनिया गांधी को इटैलियन बहू’ और राहुल गांधी को पप्पू’ कहा. प्रियंका गांधी राजनीति में सक्रिय नहीं होंइसलिए उनके पति राॅबर्ट वाड्रा पर भी भाजपा ने आक्रामक हमले किए. लेकिन प्रियंका गांधी के खिलाफ इस स्तर का कोई हमला नहीं किया जा सकता.
इसकी वजह पूछे जाने पर वे बताते हैं, ‘रायबरेली में जब सोनिया गांधी पहला चुनाव लड़ रही थीं तो प्रियंका गांधी ने एक भावनात्मक अपील से जिस तरह से अरुण नेहरू का चौथे स्थान पर रहना सुनिश्चित कर दिया थावह कोई भुला नहीं सकता. अगर मोदी या अमित शाह में से किसी के स्तर पर प्रियंका गांधी के खिलाफ कोई हल्की बात की जाती है तो इसकी काफी संभावना है कि प्रियंका गांधी इसे एक ऐसा भावुक मुद्दा बना दें जिस पर आम लोगा उनके साथ हो जाएं और भाजपा के खिलाफ.
भाजपा में प्रियंका गांधी को लेकर यह डर भी है कि अब राॅबर्ट वाड्रा का मुद्दा वैसे नहीं उठाया जा सकता जैसे पहले उठाया जा रहा था. क्योंकि अब अगर भाजपा यह मुद्दा उठाती है तो प्रियंका गांधी इसके जवाब में यह कह सकती है कि पांच साल से केंद्र में और हरियाणा में भाजपा की सरकार है तो फिर वाड्रा के खिलाफ कार्रवाई क्यों नहीं की गईवे यह भी कह सकती हैं कि उनके पति के जरिए उन्हें निशाना बनाया जा सकता है.
कई लोगों को यह भी लगता है कि जिस तरह से पीड़ित’ कार्ड खेलकर सियासी लाभ लेने में नरेंद्र मोदी माहिर हैंउसी तरह की कोशिश प्रियंका गांधी की ओर से भी हो सकती है. नरेंद्र मोदी अक्सर यह कहते हैं कि वे गरीब के बेटे हैं, 2002 के दंगों को मुद्दा बनाकर अकारण ही उन पर सियासी हमले किए गए और कांग्रेस के लोग गरीब और आम परिवार से होने की वजह से उन्हें निशाना बनाते हैं. नरेंद्र मोदी को इन चीजों का फायदा उठाने में सुविधा तब अधिक हो जाती है जब मणिशंकर अय्यर जैसे नेता कभी यह कह देते हैं कि वे कांग्रेस अधिवेशन में आकर चाय बेच सकते हैं या फिर यह कि मोदी बहुत ही नीच’ किस्म के आदमी हैं.
अगर प्रियंका गांधी इस सियासी रास्ते पर गईं तो उनके पास भी खुद को पीड़ित’ साबित करने के लिए काफी मसले हैं. वे कह सकती हैं कि उनके पिता ने देश के लिए कुर्बानी दी. उनकी मां ने भारत आने के बाद लगातार देश के लिए काम किया फिर भी उन्हें इटैलियन कहकर उन पर लगातार सियासी हमले हुए. उनके भाई को राष्ट्रीय पप्पू’ घोषित कर दिया गया. उनके पति पर भ्रष्टाचार के बेबुनियाद आरोप लगे और अब तो उनके बच्चों को भी निशाना बनाया जा रहा है. अगर प्रियंका ने नरेंद्र मोदी की तरह पीड़ित’ कार्ड खेला तो इसकी काफी अधिक संभावना है कि वे भारी पड़ जाएंगी.
भाजपा के राष्ट्रीय नेताओं और पूर्वी उत्तर प्रदेश के नेताओं को प्रियंका गांधी से इस बात का डर भी लग रहा है कि वे कहीं वाराणसी से लोकसभा चुनावों में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ उम्मीदवार न बन जाएं. उन्हें लग रहा है कि प्रियंका गांधी के उम्मीदवार बनने पर समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी अपना उम्मीदवार नहीं उतारेंगे और बनारस की सीट पहले जितनी आसान नहीं रहेगी. प्रियंका गांधी के मोदी के खिलाफ मैदान में उतरने का असर सिर्फ वाराणसी और पूर्वी उत्तर प्रदेश में ही नहीं बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर भी सियासी विमर्श पर पड़ेगा.

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