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अखिलेश यादव पूर्व मुख्यमंत्री: 50 प्रतिशत अतिरिक्त मूल्य देने और किसानों की आय दुगनी करने का भाजपा का वादा क्या हुआ?

समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष एवं पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने कहा है कि किसानों को समय से सिंचाई सुविधा नहीं मिल रही है। बुन्देलखण्ड में किसान संकट से जूझ रहे हैं। खाद-बीज तक का अभाव है। जब वे अपनी मांग को लेकर प्रदर्शन करते हैं तो उनके खिलाफ बल प्रयोग होता है ताकि उनकी आवाज दबाई जा सकी। महोबा, बांदा, हमीरपुर में किसान आत्महत्या कर चुके है। महोबा में 55 वर्षीय किसान उमा शंकर की जब फसल छुट्टा जानवरों ने बर्बाद कर दी तो क्षोभ और अवसाद में गत सोमवार को उसने आत्महत्या कर ली। उस पर 18 लाख रूपए का कर्ज भी था। 
       दुःखद है कि भाजपा राज में किसानों के उत्पीड़न एवं आत्महत्या करने का सिलसिला जारी है। किसानों को लगातार धोखा दिया जा रहा है। किसानों को कृषि उत्पाद के लागत मूल्य में 50 प्रतिशत अतिरिक्त मूल्य देने और किसानों की आय दुगनी करने का भाजपा का वादा क्या हुआ? किसानों की कर्जमाफी के नाम पर एक रूपए, सात रूपए और बीस रूपए तक के चेक बंटे है। बार-बार पूछने पर भी कर्जमाफ किसानों का ब्योरा सरकार नहीं दे रही है। 
       अपराधों पर रोक लगाने में नाकाम और कुंठित भाजपा सरकार आलू किसानों की पीड़ा समझने के बजाय झूठे मुकदमों में फंसाने की साजिश करने में कोई संकोच तक नहीं करती है। यह भाजपा सरकार का असली चेहरा है।
       समाजवादी सरकार किसानों और गांव-गरीबों के हितों के लिए प्रतिबद्ध रही है। किसानों की 50 हजार रूपए तक की कर्जमाफी के साथ उनकी बंधक जमीन की नीलामी पर रोक लगा दी गई थी। प्रदेश के बजट में 75 प्रतिशत गांव और किसान के लिए रखा था। किसानों की फसल का बीमा और आपदा राहत की व्यवस्था की गई थी। किसानों को 22 घंटे बिजली दी गई थी। उन्हें मुफ्त सिंचाई सुविधा मिली थी। बुन्देलखण्ड को समाजवादी सरकार ने विशेष पैकेज दिया था। समाजवादी सरकार में ही बुन्देलखण्ड में सूखा पड़ने पर राहत सामग्री पैकेट का वितरण किया गया। अवस्थापना सुविधाओं के विस्तार के साथ कृषि अर्थव्यवस्था को मजबूत करने में समाजवादी सरकार ने कुछ उठा नहीं रखा था। 
       श्री अखिलेश यादव ने कहा है कि भाजपा सरकारें केेन्द्र की हों या प्रदेश की उनका किसान के दुःख दर्द से कोई वास्ता नहीं है। गांव-गरीब, खेती-किसान कभी भाजपा की प्राथमिकता में नहीं रहे। भाजपा की मुख्य चिंता कारपोरेट घरानों के हित साधन की रहती है। अभी पिछले दिनों लखनऊ में भाजपा ने निवेशक सम्मेलन के नाम पर बड़े पूंजी घरानों का जमावड़ा किया जिसमें कृषि को समृद्ध करने की किसी ठोस योजना पर चर्चा तक नहीं हुई। श्रम प्रधान इस देश में पूंजी प्रधान उद्योगों की अव्यवहारिकता पर गांधी जी से लेकर चौधरी चरण सिंह तक की एक राय रही है लेकिन भाजपा ने सत्ता पाते ही स्वदेशी को छोड़कर बड़ी पूंजी की हिमायत शुरू कर दी है।
       बात बहुत साफ है जब चार वर्ष में भाजपा की केन्द्र सरकार किसानों का कोई कल्याण नहीं कर सकी तो राज्य सरकार से विकास की एक ईंट भी रखने की उम्मीद कैसे की जा सकती है?


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