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सरकारी क्षेत्र में अपर्याप्त तकनीकी साधनों के कारण क्षयरोग के प्राथमिक संकेतो को चिन्हित करने प्रयास विफल हो जाते हैं: प्रो0 वीणा दास


लखनऊ विश्वविद्यालय मे चल रहे समाजशास्त्री परिषद के सम्मेलन के तीसरे दिन अध्यात्मिक तथा शोध परक चर्चा की गयी। इस दौरान देश भर से आयें शोध समितियों के विभिन्न प्रतिभागियों ने शोध पत्र प्रस्तुत किए। प्रो0 राधाकमल मुखर्जी, प्रसिद्ध समाजशास्त्री, स्मारक व्याख्यान का आयोजन 11ः00 बजे मालवीय सभागार में किया गया। 
   डा0 राजीव कुमार, उपाध्यक्ष नीती आयोग, ने भी अपने उद्घाटन सत्र के वक्तव्य मे प्रो0 मुखर्जी का स्मरण  किया। प्रो0 मुखर्जी की स्मृति में उनकी समिति तथा आई0सी0एस0एस0आर0 द्वारा भारतीय समाजशास्त्री परिषद के सम्मेलन में 2010 से व्याख्यान का आयोजन किया जाता रहा हैं।
 इस वर्ष का प्रो0 राधाकमल मुखर्जी व्याख्यान प्रो0 वीणादास, प्रो0 जॉन हाव्किन्स विश्वविद्यालय अमेरिका द्वारा किया गया।

    प्रो0 वीणा दास ने ‘टी0बी0 इन एन इन्डियन सिटी‘ नामक अपने व्याख्यान  में भारत में क्षय रोग के नियन्त्रण में निजी तथा सरकारी क्षेत्र की भूमिका का समाजशास्त्री विवेचन किया। उन्होंने बताया कि डॉ0 राधाकमल मुखर्जी की सामाजिक पास्थितिकी अवधारणा पूरे विश्व में समाजशास्त्री अध्ययनों में आज भी प्रासंगिक हैं। 
    भारत में क्षय रोग के सम्बन्ध में सामाजिक परिस्थिति के द्वारा हम बेहतर समाजशास्त्री विवेचन कर सकते हैं। स्वास्थ्य की सामाजिक परिस्थितिकी को मगर हम देखे तो इसके एक सिरे पर प्रशिक्षित चिकित्सक है तो दूसरे सिरे पर मरीज, जो कि सामाजिक पारिस्थितिकीय कारणो मे एक दूसरे से दूर होते जाते हैं। 
     प्रो0 दास आगे अपने  समाजशास्त्री विश्लेषण मे पटना तथा मुम्बई के अध्ययनों का हवाला देते हुए क्षय रोग निरोधक केन्द्रों तथा निजी क्षेत्र की भूमिका बारे मे बताया। उनका मानना है कि मरीजों के ऊपर पर्याप्त देख-रेख के अभाव के कारण सरकारी केन्द्रो से रोगी दूर होते जाते हैं यही कारण है कि यह बीमारी आज एक महामारी का रुप ले चुकी हैं। 
    सरकारी क्षेत्र में पर्याप्त तकनीकी साधनों के अभाव के कारण इस बीमारी के प्राथमिक संकेतो को चिन्हित करने प्रयास विफल हो जाते हैं। प्रो0 वीणा दास का मानना है कि विगत वर्षो में क्षय रोग के नियंत्रण में विदेशी स्वयंसेवी स्वास्थ्य संगठनों की भारत में भूमिका बढ़ी हैं तथा वर्तमान परिवेश में सरकारी तथा निजी क्षेत्र को सामंजस्यपूर्ण ढ़ग से काम कर मरीजों को क्षय मुक्त करना होगा।
        तीसरे सत्र में जे0 एन0 यू0 की मैत्रीय चैधरी व के0एस0 जेम्स,  यूनिर्वसिटी ऑफ मैरीलैण्ड अमेरिका की सोनालडे देसाई ने अपने शोधपरक व्याख्यान प्रस्तुत किये। जे0एन0यू0 के मैत्रीय चैधरी ने वर्तमान परिवेश में मीडिया तथा अकादमिक जगत की भूमिका का विष्लेशण सूचना तकनीकी तथा वैश्वी करण के संदर्भ में किया। 
        मैत्रीय चौधरी के अनुसार सामाजिक मीडिया ने आज एक ऐसी परिधि का सृजन किया हैं। जिसनें लोगों को सीमित दायरे में बॅध रखा हैं। सूचना प्रौद्योगिकी का प्रभाव 90 के दशक से बढता जा रहा है, परन्तु इस सूचना तकनीकी ने वैचारिक ध्रूवीकरण पैदा कर दिया हैं।

        उनका मानना है कि समाजशास्त्र के समान्य बोध तथा सांस्कृति वर्चस्व के कारण सूचना की अधिकता ने समाज के नेतृत्व को भ्रमित कर दिया हैं अथवा यह सूचनायें सामाजिक वास्तविकता का प्रतिनिधित्व नही करती हैं। 
         मैत्रीय चौधरी के अनुसार वैश्वीकृत जगत में लोकतंत्र को बचाने के लिये मीडिया तथा अकादमिक जगत की महत्वपूर्ण भूमिका है लेकिन बाजार ने अपने लाभ के लिये जिस वैचारिक ध्रुवीकरण को जन्म दिया हैं उसने इन संस्थाओं को अपनी जकड में ले लिया हैं।
        सोनाल्डे देसाई ने नव उदार वादी आर्थिक रुपान्तरण तथा ग्रामीण अभिजात्य की विवेचना करते हुए अन्य पिछडे वर्गों में आरक्षण के दृष्टिकोण का वर्णन किया हैं। गुजरात के पाटीदारों का उल्लेख करते हुए देसाई ने बताया कि भारत में कृषि जोतो के विखण्डन ताकि खेती के अलाभकारी होने के कारण अर्थव्यवस्था में गृहस्थ कृषक का योगदान 75 प्रतिशत से घटकर 56 प्रतिशत हो गया हैं। घटी हुई आबादी में से मात्र 10 प्रतिशत आबादी ही सेवाओं में समाहित हो पायी हैं।
         निजी क्षेत्र में कम वेतन, व्यावसायिक अनिश्चितता के कारण यह पारम्परिक कृषक जातियां यह महसूस करती है कि यह आरक्षण के माध्यम से अपनी आर्थिक-सामाजिक स्थिति में सुधार कर सकती हैं।
        जे0एन0यू0 के जे0एस0 जेम्स ने भारत में मध्यम वर्ग की विवेचना लैगिंक लाभांश के संदर्भ में की हैं। जेम्स का मानना है कि एशियन डवलपमेंट बैंक की रिर्पोंट के अनुसार भारत में जन्मदर में उल्लेखनीय कमी आई हैं। जिन कारणों से महिलाएं एक लैगिंक लाभांश के रुप में अस्तित्व में आई हैं। भारत में उभरते मध्यमवर्ग में महिलायें भी शामिल हो गई हैं, क्योंकि उनका कार्य केवल पुर्नरुत्पादन तक सीमित नही रह गया हैं।
        पर्यावरण तथा समाज(शोध समिति) के तत्वावधान में शोध समिति के संयोजक डा0 अनूप कुमार सिंह के नेतृत्व में शोध समिति के सदस्यों ने समाजशास्त्र विभाग की पूर्व विभागाध्यक्ष प्रो0 आभा अवस्थी तथा श्री जय नारायण पी0जी0 कालेज के पूर्व प्राचार्य डा0 जे0पी0 मिश्र को स्मृति चिह्न देकर सम्मानित किया।   

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