UPBIL/2018/70352

कुछ लोग अपने जीवन के प्रारम्भ में ही अपने कर्तव्यों को समझ लेते है; कुछ समझने में शोषित होते है


एक कहावत है की अमीर बच्चे बचपन के बाद जवानी देखते है; गरीब बच्चे बचपन के बाद बुढ़ापा ा अब यही देखे बचपन बाल मज़दूरी में गुजरा तो पूरी जवानी भी मजबूरियों के विकट घेरे के हवाले रही. जीवन का बड़ा हिस्सा बड़े लोगों को और बड़ा बनाने की सेवा-टहल में या कहें कि किसी तरह ज़िंदा रहने की जुगत में गुजरा. गरीब बस्तियों के अधिकतर परिवारों की तरह कई सालों से उनके परिवार के लिए भी बरसात का मतलब मुसीबतों से मुठभेड़ करना रहा है. यह सालाना आफत है कि घरों में सीवर का पानी घुस आता है और हफ़्तों बाहर निकलने का नाम नहीं लेता. सड़ांध और रोग-बीमारियों का बसेरा हो जाता है, फोड़े-फुंसियों से बच्चे-बूढ़े हलकान हो जाते हैं. इलाज का बोझ अलग से पैबस्त हो जाता है. गोहार लगती है लेकिन नगर निगम उफ़ भी नहीं करता.

कमाल यह कि आज उसी मामूली आदमी ने लखनऊ नगर निगम के चुनाव में पार्षदी के लिए ताल ठोंकी है. नाम है वीरेन्द्र कुमार गुप्ता. वह इंदिरा नगर के मैथिलीशरण गुप्त वार्ड में रहते हैं. जर्जर हो चली पान की दूकान से कहने भर को उनका घर चलता है.    

जैसा कि आम आदमी के साथ होता है- आर्थिक मजबूरियों ने उनके जीवन को भी ऐसा चकरघिन्नी बना रखा था कि उनके लिए बेहतरी का सपना देख पाना भी जैसे सपना हो गया था. आंखें देर से खुलीं और जब खुलीं तो बहुत दूर तलक देखने लगीं. इन सवालों से जूझने लगीं कि आख़िर गरीब गरीब क्यों होता है, कि गरीब के लिए हाड़तोड़ मेहनत के बाद भी दो जून की रोटी का इंतजाम इतना भारी क्यों हो जाता है, कि मेहनतकश गरीब क्यों लुटता-पिटता रहता है, कि उसकी दुख-तकलीफ़ें अनसुनी क्यों रहती हैं, कि उसके लिए सुनवाई के दरवाजे बंद के बंद क्यों बने रहते हैं...

समझदारी और हिम्मत ने पंख फैलाए. वीरेन्द्र कुमार गुप्ता ने हालात से समझौता करना छोड़ दिया, समझा कि अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ सकता. पुलिसवाले ने आइसक्रीम बेचनेवाले से मुफ़्त का माल खाना चाहा और मना करने पर उसे पीट दिया तो वीरेन्द्र कुमार गुप्ता पुलिसवाले से उलझ पड़े. दबाव बना तो पुलिसवाले को माफी मांगनी पडी. तकरोही के दलित युवक की पुलिस हिरासत में पिटाई से मौत हुई और पुलिस ने कहानी गढ़ कर चार मुसमानों को फंसा दिया तो वीरेन्द्र कुमार गुप्ता इस अत्याचार के ख़िलाफ़ खड़े हो गए. सरकारी स्कूल में बच्चों की पिटाई, पढ़ाई में ढिलाई, मिडडे मील में गड़बड़ी और स्कूल में साफ़-सफाई के सवाल को आम दिलचस्पी का विषय बनाने का बड़ा काम किया.      

मुसीबतों के मारों को जोड़ा और बिना ढोल-नगाड़ा बजाये गरीब-गुरबों के हित-अधिकारों का मोर्चा खोला. उसे जीने का अधिकार अभियान नाम दिया और उसके तहत मासिक चौपाल की शुरूआत की. यह बदलाव की करवट थी. आम आदमी पार्टी ने उनके इसी जज्बे और उनकी लड़ाकू पहचान को सराहा और उन्हें अपना उम्मीदवार बनाया.

वीरेन्द्र कुमार गुप्ता सचमुच आम आदमी हैं. उनके बच्चे सरकारी स्कूल में पढ़ते हैं, थोड़ी मजदूरी भी कर लेते हैं. पत्नी निजी स्कूल में आयागिरी का काम करती हैं.

उनके चुनाव प्रचार में उन्हीं जैसे आम लोगों का जुटान है. इसमें घरों में काम करनेवाली महिलाएं, दिहाड़ी मज़दूर और शिक्षित बेरोजगारों के अलावा सामाजिक कार्यकर्ता भी शामिल हैं. और हां, 110 वार्डों में वीरेन्द्र कुमार गुप्ता अकेले ऐसे उम्मीदवार हैं जिनका परचा रंगीन नहीं, काला-सफ़ेद है. वह कहते हैं कि हमें अपनी बात पर भरोसा है, तीमझाम पर नहीं.
  

सेना द्वारा घर में नजरबंद राष्ट्रपति रॉबर्ट मुगाबे ने इस्तीफा देने से किया इनकार


राबर्ट मुगांबे के चार दशक से चले आ रहे जिमबावे की सत्ता पर पकड़ अब ढीली पडती प्रतीत होती है। शनिवार की रात को हजारों लोगो की भीड़ देश के नगरों मे उनके त्यागपत्र की मांग करती देखी गई  है। उनकी सत्तारूढ़ पार्टी ने ही राष्ट्रपति को बर्खास्त करने की तैयारी कर ली है  
पिछले सप्ताह सेना प्रमुख ने सत्ता की बागडोर अपने हाथो में ले ली है उनसे रविवार की सुबह 93 वर्ष के राष्ट्रपति मिलने वाले है यह वहां के टीवी चैनल के माध्यम से प्रसारित किया गया है।
सेना के दखल के पांच दिनों बाद यह दूसरी बार बहस है और जानू-पी एफ नेताओ ने मुगांबे को राष्ट्रपति पद से त्यागपत्र देने एवं पार्टी के नेता व अपने प्रथम सचिव पद से त्यागपत्र देने के एक प्रस्ताव की मांग के लिये बुलाते है. अगले सप्ताह संसद महाअभियोग की प्रक्रिया अपनायेगी। 

सेना के सूत्रों के अनुसारए राष्ट्रपति ने अपने विश्वसनीय मित्र जो एक कैथोलिक पादरी है से सेना प्रमुख के बीच वार्ता की मध्यस्थता करने के लिये कहा है। मुगांबे ने इस तरह के पूर्व मध्यस्थता के प्रस्ताव को इस सुझाव के साथ कि वह सार्थक समझौता बनाने के करीब हैं ठुकरा  दिया था।
अब शायद ही कोई विकल्प इस निरंकुष शासक के लिये बचा है जिसने जिम्बावे को मिश्रित बलप्रयोग, घूस और क्रन्तिकारी भाषणो द्वारा 40 साल से राज किया है। सुरक्षा व्यवस्था की कुछ शाखाओं मे समर्थन पुलिस सहित विलुप्त हो चुका है एवं बड़े नेता पकड़ लिये गये है।
 शनिवार को हरारे की गलियों मे लोगो का जमवाड़ा लगा है लोग नारे लगा रहे है, गा रहे है, और तख्ती हाथ मे लिये है। बहुत से लोग सैनिको को गले लगा रह है। लोगों के मार्च को सेना की अनुमति है और यह अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर सेनाप्रमुख की छवि ऊचां करेगी।
जिम्बाब्वे में सेना द्वारा सत्ता पर कब्जा जमाने के बाद से राजनीतिक संकट बना हुआ है. बीबीसी के मुताबिक सेना द्वारा घर में नजरबंद राष्ट्रपति रॉबर्ट मुगाबे ने इस्तीफा देने की लगातार मांग के बावजूद पद छोड़ने से इनकार कर दिया है. इससे पहले कुछ खबरों में कहा गया था कि बर्खास्त उपराष्ट्रपति इमर्सन मननगागवा राष्ट्रपति रॉबर्ट मुगाबे की जगह देश का नेतृत्व संभाल सकते हैं. लेकिन अभी तक इसकी पुष्टि नहीं हो पाई है.
जिम्बाब्वे की सेना ने बुधवार को राजधानी हरारे के प्रमुख प्रतिष्ठानों के अलावा सरकारी टेलिविजन चैनल को अपने कब्जे में ले लिया था. सेना ने अपने कदम को तख्ता पटल की कोशिश मानने से इनकार किया था. उसने कहा था कि यह कदम राष्ट्रपति रॉबर्ट मुगाबे के आसपास मौजूद अपराधियों को काबू करने और उन्हें न्याय के कटघरे में लाने के लिए है. इस कार्रवाई के बाद से राष्ट्रपति रॉबर्ट मुगाबे और उनका परिवार घर में नजरबंद है.
शुक्रवार को जारी बयान के मुताबिक सेना ने कहा है कि वह अपराधियों की पहचान करके उनके खिलाफ कार्रवाई कर रही है. इसके साथ-साथ राष्ट्रपति रॉबर्ट मुगाबे से भी बातचीत कर रही है. सेना ने आगे कहा है कि राष्ट्रपति के साथ बातचीत का जो भी परिणाम आएगाउसके बारे में जनता को बहुत जल्द बता दिया जाएगा. 93 वर्षीय रॉबर्ट मुगाबे 1980 में ब्रिटेन से आजादी मिलने के बाद से जिम्बाब्वे के राष्ट्रपति हैं. इस दौरान उनकी सरकार पर मानवाधिकारों के उल्लंघन से लेकर प्रशासनिक गड़बड़ियों तक कई गंभीर आरोप लग चुके हैं.


सरकारी क्षेत्र में अपर्याप्त तकनीकी साधनों के कारण क्षयरोग के प्राथमिक संकेतो को चिन्हित करने प्रयास विफल हो जाते हैं: प्रो0 वीणा दास


लखनऊ विश्वविद्यालय मे चल रहे समाजशास्त्री परिषद के सम्मेलन के तीसरे दिन अध्यात्मिक तथा शोध परक चर्चा की गयी। इस दौरान देश भर से आयें शोध समितियों के विभिन्न प्रतिभागियों ने शोध पत्र प्रस्तुत किए। प्रो0 राधाकमल मुखर्जी, प्रसिद्ध समाजशास्त्री, स्मारक व्याख्यान का आयोजन 11ः00 बजे मालवीय सभागार में किया गया। 
   डा0 राजीव कुमार, उपाध्यक्ष नीती आयोग, ने भी अपने उद्घाटन सत्र के वक्तव्य मे प्रो0 मुखर्जी का स्मरण  किया। प्रो0 मुखर्जी की स्मृति में उनकी समिति तथा आई0सी0एस0एस0आर0 द्वारा भारतीय समाजशास्त्री परिषद के सम्मेलन में 2010 से व्याख्यान का आयोजन किया जाता रहा हैं।
 इस वर्ष का प्रो0 राधाकमल मुखर्जी व्याख्यान प्रो0 वीणादास, प्रो0 जॉन हाव्किन्स विश्वविद्यालय अमेरिका द्वारा किया गया।

    प्रो0 वीणा दास ने ‘टी0बी0 इन एन इन्डियन सिटी‘ नामक अपने व्याख्यान  में भारत में क्षय रोग के नियन्त्रण में निजी तथा सरकारी क्षेत्र की भूमिका का समाजशास्त्री विवेचन किया। उन्होंने बताया कि डॉ0 राधाकमल मुखर्जी की सामाजिक पास्थितिकी अवधारणा पूरे विश्व में समाजशास्त्री अध्ययनों में आज भी प्रासंगिक हैं। 
    भारत में क्षय रोग के सम्बन्ध में सामाजिक परिस्थिति के द्वारा हम बेहतर समाजशास्त्री विवेचन कर सकते हैं। स्वास्थ्य की सामाजिक परिस्थितिकी को मगर हम देखे तो इसके एक सिरे पर प्रशिक्षित चिकित्सक है तो दूसरे सिरे पर मरीज, जो कि सामाजिक पारिस्थितिकीय कारणो मे एक दूसरे से दूर होते जाते हैं। 
     प्रो0 दास आगे अपने  समाजशास्त्री विश्लेषण मे पटना तथा मुम्बई के अध्ययनों का हवाला देते हुए क्षय रोग निरोधक केन्द्रों तथा निजी क्षेत्र की भूमिका बारे मे बताया। उनका मानना है कि मरीजों के ऊपर पर्याप्त देख-रेख के अभाव के कारण सरकारी केन्द्रो से रोगी दूर होते जाते हैं यही कारण है कि यह बीमारी आज एक महामारी का रुप ले चुकी हैं। 
    सरकारी क्षेत्र में पर्याप्त तकनीकी साधनों के अभाव के कारण इस बीमारी के प्राथमिक संकेतो को चिन्हित करने प्रयास विफल हो जाते हैं। प्रो0 वीणा दास का मानना है कि विगत वर्षो में क्षय रोग के नियंत्रण में विदेशी स्वयंसेवी स्वास्थ्य संगठनों की भारत में भूमिका बढ़ी हैं तथा वर्तमान परिवेश में सरकारी तथा निजी क्षेत्र को सामंजस्यपूर्ण ढ़ग से काम कर मरीजों को क्षय मुक्त करना होगा।
        तीसरे सत्र में जे0 एन0 यू0 की मैत्रीय चैधरी व के0एस0 जेम्स,  यूनिर्वसिटी ऑफ मैरीलैण्ड अमेरिका की सोनालडे देसाई ने अपने शोधपरक व्याख्यान प्रस्तुत किये। जे0एन0यू0 के मैत्रीय चैधरी ने वर्तमान परिवेश में मीडिया तथा अकादमिक जगत की भूमिका का विष्लेशण सूचना तकनीकी तथा वैश्वी करण के संदर्भ में किया। 
        मैत्रीय चौधरी के अनुसार सामाजिक मीडिया ने आज एक ऐसी परिधि का सृजन किया हैं। जिसनें लोगों को सीमित दायरे में बॅध रखा हैं। सूचना प्रौद्योगिकी का प्रभाव 90 के दशक से बढता जा रहा है, परन्तु इस सूचना तकनीकी ने वैचारिक ध्रूवीकरण पैदा कर दिया हैं।

        उनका मानना है कि समाजशास्त्र के समान्य बोध तथा सांस्कृति वर्चस्व के कारण सूचना की अधिकता ने समाज के नेतृत्व को भ्रमित कर दिया हैं अथवा यह सूचनायें सामाजिक वास्तविकता का प्रतिनिधित्व नही करती हैं। 
         मैत्रीय चौधरी के अनुसार वैश्वीकृत जगत में लोकतंत्र को बचाने के लिये मीडिया तथा अकादमिक जगत की महत्वपूर्ण भूमिका है लेकिन बाजार ने अपने लाभ के लिये जिस वैचारिक ध्रुवीकरण को जन्म दिया हैं उसने इन संस्थाओं को अपनी जकड में ले लिया हैं।
        सोनाल्डे देसाई ने नव उदार वादी आर्थिक रुपान्तरण तथा ग्रामीण अभिजात्य की विवेचना करते हुए अन्य पिछडे वर्गों में आरक्षण के दृष्टिकोण का वर्णन किया हैं। गुजरात के पाटीदारों का उल्लेख करते हुए देसाई ने बताया कि भारत में कृषि जोतो के विखण्डन ताकि खेती के अलाभकारी होने के कारण अर्थव्यवस्था में गृहस्थ कृषक का योगदान 75 प्रतिशत से घटकर 56 प्रतिशत हो गया हैं। घटी हुई आबादी में से मात्र 10 प्रतिशत आबादी ही सेवाओं में समाहित हो पायी हैं।
         निजी क्षेत्र में कम वेतन, व्यावसायिक अनिश्चितता के कारण यह पारम्परिक कृषक जातियां यह महसूस करती है कि यह आरक्षण के माध्यम से अपनी आर्थिक-सामाजिक स्थिति में सुधार कर सकती हैं।
        जे0एन0यू0 के जे0एस0 जेम्स ने भारत में मध्यम वर्ग की विवेचना लैगिंक लाभांश के संदर्भ में की हैं। जेम्स का मानना है कि एशियन डवलपमेंट बैंक की रिर्पोंट के अनुसार भारत में जन्मदर में उल्लेखनीय कमी आई हैं। जिन कारणों से महिलाएं एक लैगिंक लाभांश के रुप में अस्तित्व में आई हैं। भारत में उभरते मध्यमवर्ग में महिलायें भी शामिल हो गई हैं, क्योंकि उनका कार्य केवल पुर्नरुत्पादन तक सीमित नही रह गया हैं।
        पर्यावरण तथा समाज(शोध समिति) के तत्वावधान में शोध समिति के संयोजक डा0 अनूप कुमार सिंह के नेतृत्व में शोध समिति के सदस्यों ने समाजशास्त्र विभाग की पूर्व विभागाध्यक्ष प्रो0 आभा अवस्थी तथा श्री जय नारायण पी0जी0 कालेज के पूर्व प्राचार्य डा0 जे0पी0 मिश्र को स्मृति चिह्न देकर सम्मानित किया।   

बारिश की वजह से अब तक 12 लोगों की मौत; चेन्नई का पूर्वोत्तर मानसून फिर क़हर ढा रहा

अजहर खान ; प्रेसमैन चेन्नई 
चेन्नई में बारिश एक बार फिर क़हर ढा रही है. ख़बर के मुताबिक़ 27 अक्टूबर को शहर में आए पूर्वोत्तर मानसून की आठ दिन की बारिश की वजह से अब तक 12 लोगों की मौत हो चुकी है. रिपोर्ट में बताया गया कि अब तक कुल 552.2 मिलीमीटर बारिश दर्ज की जा चुकी है. यह हर साल बारिश के सीज़न में होने वाली कुल 750 मिलीमीटर बारिश का 74 प्रतिशत है. पूर्वोत्तर मानसून की वजह से होने वाली यह बारिश इस इलाके में 1 अक्टूबर से 15 दिसंबर तक होती है.
गुरुवार को हुई भारी बारिश के बाद शुक्रवार सुबह बारिश नहीं होने से थोड़ी राहत मिली थी, लेकिन शाम को फिर तेज़ बारिश शुरू हो गई. मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक़ तेज बारिश ने चेन्नई के मयलापुर, फोरशोर एस्टेट और तांब्रम, क्रोमपेट और पल्लवरम के दक्षिणी इलाक़ों को बुरी तरह प्रभावित किया है. ट्रैफ़िक भी लगातार दो दिन जाम रहा. चेन्नई के ज़िला कलेक्टर ने शनिवार को स्कूलों को बंद कर दिये है. ज़्यादा बुरी ख़बर यह है कि मौसम विभाग ने अगले 24 घंटों में तमिलनाडु के उत्तर तटीय क्षेत्रों में और भारी बारिश होने की आशंका जताई है. साथ ही चेन्नई और उसके उपनगरों में जोर हवाओं की आंधी आने का पूर्वानुमान भी लगाया गया है.
इधर केन्द्र सरकार गुजरात व हिमांचल प्रदेश के विधान सभा चुनाव मे मग्न है, उधर, बारिश से होने वाली मुसीबतों से निपटने मे सरकारी नकामी को लेकर मुख्यमंत्री के पलानीसामी सरकार को लोगों का ग़ुस्सा झेलना पड़ रहा है. हालांकि मुख्यमंत्री कुछ और ही दलील देते नज़र आए. जलभराव को लेकर मुख्यमंत्री ने कहा कि पूर्व की जयललिता सरकार ने साल 2015 में निचले इलाक़ों से पानी निकालने की जो योजना परिकल्पित की थी उसकी वजह से आज पानी जमा नहीं हुआ है. मुख्यमंत्री ने उप-मुख्यमंत्री ओ पन्नीरसेल्वम और वरिष्ठ अधिकारियों के साथ कुछ इलाकों का दौरा किया है. बारिश के चलते राहत शिविरों में गए लोगों के लिए खाने के पैकेट, कपड़े, चटाई और चादर बांटे गए हैं.

434 यूपी पीपीएस अफसरों की स्क्रीनिंग, तीन की नौकरी खतरे में

लखनऊ (प्रेसमेन)। पुलिस महकमे में 50 की उम्र पार कर चुके कथित नकारा अधिकारियों को चिह्नित किए जाने की कार्यवाही में 434 पीपीएस अधिकारियों की स्क्रीनिंग की गई। प्रमुख सचिव गृह अरविंद कुमार की अध्यक्षता में गुरुवार को स्क्रीनिंग कमेटी की अहम बैठक हुई, जिसमें 118 एएसपी व 316 डिप्टी एसपी की स्क्रीनिंग की गई। बैठक में प्रमुख सचिव नियुक्ति दीपक त्रिवेदी व डीजीपी सुलखान सिंह सहित अन्य अधिकारी मौजूद थे।

सूत्रों के मुताबिक तीन अधिकारियों को चिह्नित कर लिये गये है, जिनकी बर्खास्तगी की तैयारी है। कुछ अन्य के नाम की भी सभीक्षा चल रही है। हालांकि अधिकारियों का कहना है कि स्क्रीनिंग पूरी कर ली गई है। अंतिम निर्णय शासन अधीन है। जल्द ही मुख्य सचिव की अध्यक्षता में उ0प्र0 के आइपीएस अधिकारियों की स्क्रीनिंग की जाएगी। इसके लिए कमेटी का गठन किया जा रहा है। नवंबर माह के अंतिम सप्ताह तक आइपीएस अधिकारियों की स्क्रीनिंग भी पूरी कर ली जाएगी।

स्क्रीनिंग कमेटी ने बैठक में 50 की उम्र पार कर चुके चिह्नित पीपीएस अधिकारियों के कैरेक्टर रोल से लेकर उनकी कार्यशैली व प्रदर्शन का ब्योरा देखा। खासकर पिछले 10 सालों में अधिकारियों का सर्विस रिकार्ड देखा गया कि इस अवधि में उनकी कार्यशैली किस प्रकार की रही। किस अधिकारी पर किस प्रकार के आरोप लगे और किसे किन मामलों में दंडित किया गया। किस पर बार-बार आरोप लगते रहे। कितनों के खिलाफ किस प्रकार की विभागीय जांचें की गईं और उनमें उनकी भूमिका किस हद तक दोषी रही है।
इसी आधार पर दागी व नकारा अधिकारियों को तलाशा जा रहा है। ताकि उन्हें बाहर का रास्ता दिखाया जा सके। बताया गया कि प्रदेश में पीपीएस कैडर के 1200 से अधिक अधिकारी हैं। ऐसे में इस कैडर के करीब एक तिहाई अधिकारियों की स्क्रीनिंग से पुलिस मुहकमे मे हड़कंप मचा है। दूसरी ओर डीजीपी मुख्यालय स्तर पर 50 की उम्र पार कर चुके नकारा व दागी इंस्पेक्टर, उपनिरीक्षक, दीवान व सिपाही को चिह्नित करने की प्रकिया चल रही है।