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जब हमारे एक नायक को विदेशी फिल्म फेस्टिवल में सर्वश्रेष्ठ ‘नायिका’ का पुरस्कार मिला!


निर्मल पांडे को आप आज भी नहीं भूले होंगे. बेवक्त जिसे वक्त ने लील लिया (1962-2010) उस अभिनेता ने हिंदी फिल्मों में स्टीरियोटाइप्ड होने के साथ ही ‘बैंडिट क्वीन’, ‘ट्रेन टू पाकिस्तान’, ‘इस रात की सुबह नहीं’ और ‘दायरा’ जैसी बेहतरीन फिल्मों में काम किया था. सुधीर मिश्रा की ‘इस रात की सुबह नहीं’ तो एक कल्ट फिल्म मानी जाती है और ट्रीटमेंट की वजह से अपने वक्त से मीलों आगे की वह फिल्म भी जिसे आज भी सराहने वालों की कमी नहीं.
इन्हीं निर्मल पांडे के नाम पर एक अनोखा रिकार्ड दर्ज है जो हिंदी फिल्मों के किसी भी और नायक का कभी हो न सका. 2007 में ‘दायरा’ नामक एक फिल्म के लिए उन्हें फ्रांस स्थित वेनोसिएन फिल्म फेस्टिवल में सर्वश्रेष्ठ ‘अभिनेत्री’ का पुरस्कार मिला था! सर्वश्रेष्ठ नायिका का कोई देसी खिताब तो ‘चाची 420’ में कमल हासन तक को नसीब नहीं हुआ लेकिन औरतों के संघर्ष पर बनी अमोल पालेकर की बेहद संवेदनशील और बेहतरीन ‘दायरा’ (1997) वह फिल्म रही जिसमें आदमी होकर औरत की तरह बन-संवरकर रहने वाले अपने किरदार को अद्भुत तरह से जीवंत करने की वजह से निर्मल पांडे ने न सिर्फ दूर देश का यह अवार्ड जीता बल्कि भारत में भी खूब वाहवाही बटोरी.
निर्मल की ही तरह ‘दायरा’ को भी हिंदुस्तान में खूब वाहवाही मिली. लेकिन जैसा कि चलन में है, उस साल के राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों में ‘दायरा’ को किसी भी पुरस्कार के लायक नहीं समझा गया!

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