UPBIL/2018/70352

अधिकार और पुलिस के बीच झड़प; महिला भीड़ पर यू पी पुलिस का कहर

लखनऊ। यूपी की राजधानी लखनऊ की सड़कों से बेहद हैरान कर देने वाली तस्वीरें सामने आईं हैं। लखनऊ के हजरतगंज इलाके में बीते 32 घंटे से राज्य कर्मचारी का दर्जा और मानदेय बढ़ाने की मांग को लेकर आंदोलन कर रहीं आंगनबाड़ी की महिला कार्यकर्ताओं को सड़कों से हटाने के लिए मंगलवार दोपहर पुलिस ने उग्र रुप धारण कर लिया।
पुलिस ने महिला आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं पर जमकर लाठियां बरसा दीं। इतना ही नहीं अपनी मांगों को लेकर प्रदर्शन कर रही महिलाओं को पुलिस ने सड़कों पर दौड़ा-दौड़ा कर पीटा।पुलिस का ऐसा क्रूर रूप देख कर कुछ आंगनबाड़ी कार्यकर्त्रियों ने उनसे लोहा लेने की कोशिश तो की लेकिन उन्हें निराशा और दर्द ही मिला। यूपी पुलिस के इस क्रूर कार्रवाई की वजह से कई कार्यकर्त्रियों को काफी चोटें भी आईं हैं।
पुलिस ने प्रदर्शनकारियों को खदेड़ कर पार्क के एक कोने में समेट कर रख दिया। पुलिस की इस कार्रवाई से पूरे इलाके में भगदड़ मच गई। पुलिस की लाठियों से बचने के लिए लोगों में भगदड़ मच गई। प्राप्त ताज़ा जानकारी के मुताबिक माहौल काफी तनावपूर्ण बना हुआ है।
हालांकि इससे पहले आंगनबाड़ी कार्यकर्त्रियों को मनाने के भरसक प्रयास किए गए थे। लेकिन वे हजरतगंज से नहीं हटीं। उनकी वजह से आज भी सुबह से जाम बड़ी समस्या बना रहा। बीती देर रात प्रदेश अध्यक्ष गीतांजलि मौर्या सहित 12 लोगों को गिरफ्तार किये जाने के बाद से आंदोलनकारी कार्यकर्त्रियां नारेबाजी करती रहीं।

फिलहाल एक तरफ से रास्ता खाली कराकर आवागमन शुरू करा दिया गया। गिरफ्तार सभी आंगनबाड़ी नेताओं पर 106 और 116 के तहत मुकदमा दर्ज किया गया है। अपने नेताओं की गिरफ़्तारी और मांगों को न माने जाने से नाराज इन लोगों ने नारेबाजी कर विरोध दर्ज कराया। मुख्यत: ये लोग अपना मानदेय बढ़ाए जाने के लिए विगत 36 दिनों से प्रदेश भर में धरने पर बैठे हैं। इन लोगों का कहना है कि अब बग़ैर लिखित आदेश के कुछ भी नहीं मानेंगे।

काशी की अंतरात्मा की आवाज का एक अध्याय बंद; गिरिजा देवी नहीं रहीं

गोकुल छोड़ मथुरा में छाये, किन संग प्रीत लगाये, तड़प तड़प जिया जाय

समय के साथ भागता संगीत भले ही ऊंचा और वैविध्यपूर्ण होता जा रहा हो, लेकिन वो उतना ही नकली हो चुका है जितना अब लखनऊ का चिकनकारी वाला कुर्ता. रंग भी है, काम भी है. सजावट भी और वही अर्धपारदर्शी अहसास. लेकिन आत्मा कहीं नहीं है. सब गाने निष्प्राण कंकालों की तरह झूलते नजर आते हैं. जिनपर आप अपने अवसाद और दंभ भुनाने के लिए नाच तो सकते हैं, सुकून नहीं पा सकते.
यहां यह भी उल्लेखनीय है कि इस दौर मे योगेश प्रवीन जैसी हस्तियां ही लखनऊ की धूल मे छिपी इतिहास के करवट की सच्ची दास्तान या कथक की विरासत को अजुर्न मिश्र जैसे लोग जीवित रखे हैं।किन्तु धीरे-धीरे इसके परिस्थितकी तंत्र मे पनपी हुई विरासत शहर विस्तार का शिकार होने लगी है.
किसी आयोजन में गिरिजा देवी का आना और उन्हें गाते हुए सुन पाना. पान दबे गाल से एक खट्टी-मीठी टेर भरी वो आवाज़ जो अब शहरी महिलाओं के कंठ से सुनने को नहीं मिलती. जिसके लिए वापस लौटना ही पड़ता है गंगा की गोद में बसे इलाकों की ओर, गांवों की ओर या गांव को अपने पक्के मकानों में समेटे शहरों की ओर.
साफ है की भारत की महान हस्तियों को और दुनिया को काशी अपनी ओर क्यों आकर्षित करती रही  है इनके पीछे इन्ही विभूतियों का ही योगदान है.  
परंपराओं की गंध, मिट्टी का स्वाद और मां जैसे अपनत्व वाली ये आवाज़ थी गिरिजा देवी की. उनको गाते सुनता था तो मन करता था जाकर गोद में बैठ जाउं. एक शाम उन्हें सुन लो तो हफ्तों खुमारी छाई रहती थी. फिर कितने ही दिन उनके ऑडियो और यू-ट्यूब लिंक सुनता रहता था. इस शहर में जब-जब निराशा सिर पर नाचने लगती है, भीमसेन जोशी, किशोरी अमोनकर, गिरिजा देवी और कुमार गंधर्व ही ढांढस बंधाते हैं. राशिद ख़ान फिर से नए प्राण भरते हैं.
गिरिजा देवी की आवाज में जो ठहराव था और जो विश्वास, सच्चाई, वो लंबे संघर्षों से अर्जित हुआ था. परिवार, खासकर मां कभी भी इसके पक्ष में नहीं थीं कि वो सार्वजनिक रूप से जाएं और गाएं. वीणा वाली देवी को पूजने वाला यह समाज गाने वाली महिला को बहुत नकारात्मक दृष्टि से देखता है. लेकिन आत्मविश्वास और सच्चाई के जरिए गिरिजा हर प्रतिकूलता से लड़ती हुई गाती रहीं. यही उनकी आवाज की ताकत भी रही.
दरअसल, गिरिजा देवी की आवाज में एक टीस भरी टेर थी. यही टेर मुझे हर बार बिस्मिल्लाह खां की शहनाई में भी सुनाई दी. छन्नूलाल में यह गंवई या देसजपन नहीं है. वो मसान की होली में उड़ते फाग की तरह हैं. शिवमय, गंभीर और मीठे. लेकिन यह जो गले में बसी हुई शहनाई है न, केवल बेगम अख्तर और गिरिजा देवी को ही नसीब थी. अख्तरी बाई तो कब की अलविदा कह गईं, अब गिरिजा भी गवन बाद ससुराल चली गईं.
इस आवाज की ताकत और ठहराव को अब किसी और गले में खोज पाना मुश्किल काम है. बाकी लोग गाते हैं. कुछ उनसे सीखे या उनसे अनुशरण करने वाले भी हैं. लेकिन वो बात दूसरों में नहीं है. बाकी मधुर हैं, विविध हैं, सुगम भी. पर गिरिजा देवी जैसे गहरे, ठंडे, निर्मल और ठहराव कतई नहीं.
88 साल की उम्र में वे लगातार एक घंटे तक अपनी खनकती आवाज में गाती रहीं और और लोग मंत्रमुग्ध होकर सुनते रहे. मुझे सुर, राग और बारीकियों की कोई समझ नहीं है पर उनको सुनते हुए संगीत आपकी आत्मा तक पहुंचता है. गिरिजा जी की गायकी ने शास्त्रीय को हमेशा ही लोक के लिए सहज बनाया है. आप एक ही पंक्ति लेकर घर लौटते हैं लेकिन अपूर्ण नहीं बल्कि सम्पूर्णता के भाव के साथ. उस दिन मेरे साथ घर आयी थी- झनक झनक मोरी बाजे पायलिया.


विस्मृति, मनुष्यता का पाप है. गिरिजा जी ने हमेशा हमें इससे सतर्क किया. हमें हमारी स्मृतियों को बचाने की सीख देते हुए वो खुद एक स्मृति बन गयी हैं. मैंने उनके हर कार्यक्रम में ध्यान दिया कि प्रायः अपने प्रत्येक संगीत समारोह में वे कम समय में ही विविध राग सुनाया करती थी और कहा करती थीं की एक-एक राग गाने के लिए आधा-आधा घंटा समय चाहिए लेकिन यह उम्र गाने की नहीं सिखाने की है. बच्चों के लिए कुछ छोड़ जाने की है. इसीलिए वे कम समय में ढेर सारे राग गाती थी जिससे हम संगीत की अपनी विविधतापूर्ण विरासत से परिचित रह सकें.

गिरिजा देवी का जाना संगीत की एक परंपरा में से हमारे समय की अन्नपूर्णा के चले जाना जैसा है. काशी की कहानी बिना अन्नपूर्णा के पूरी नहीं होती. और अगर अन्नपूर्णा बिना अपनी छाया प्राण प्रतिष्ठित किए चली जाएं तो यह काशी का चला जाना है. सचमुच, संगीत परंपरा का एक काशी आज खो गया, सदा के लिए सो गया.

बनारस के परिचितों, मित्रों और 'कासीवासियों' से मिलते हुए इसपर हर बार चर्चा होती है कि काशी कहां जा रहा है. काशीनाथ सिंह अपने उपन्यास 'काशी का अस्सी' में कहते हैं कि काशी धीरे-धीरे अपनी हंसी, मस्ती खोता जा रहा है. धीरे-धीरे मर रहा है. वो शायद इसीलिए क्योंकि काशी से ठहराव खत्म होता जा रहा है. ठहराव के लिए ममत्व चाहिए और ममत्व के अंतिम प्रतिबिंबों में गिरिजा देवी प्रतिष्ठित नजर आती थीं. वो चली गईं तो काशी से एक आंचल छिन गया. अब ठहराव कहां. और बिना ठहराव के आनंद नहीं आता, न आती है प्रसन्नता. बस नाहक खीस निपोरी जा सकती है.
इसलिए गिरिजा देवी का जाना केवल संगीत की एक परंपरा का अवसान भर नहीं है. गिरिजा के साथ काशी का वो सबकुछ भी खत्म होता दिख रहा है जो हमें समय के चक्रवात में सबसे बेहतर संभाले रख सकता था. चैती, झूला, कजरी, ठुमरी और सोहर गाने वाले कुछ गले आसपास खोजने पर मिल भी जाएं तो गिरिजा वाली बात कहां से मिलेगी.

एक गिरिजा ही तो थीं. अकेले छन्नूलाल अब क्या-क्या संभालेंगे. काशी का अब क्या होगा?

हार्ट अटैक होने की आशंका को समझे और इसके दर्द से सतर्क हो जाये

 यदि आपकी डायबिटीज को दस साल से ज्यादा टाइम हो गया हो या आपको डायबिटिक रेटिनोपैथी हो, या फिर आपकी पेशाब में माइक्रो एल्ब्यूमिन की मात्रा बढ़ी हुई रहती हो तो आपको हार्ट अटैक होने की ज्यादा आशंका है. सो सबसे पहले आप जान लें कि कहीं आप इस हाई रिस्क ग्रुप में शामिल तो नहीं हैं.
अब दूसरे प्रश्न पर आते हैं. हार्ट अटैक का दर्द किस तरह का होता है? दरअसल दिल का दर्द दो तरह का होता है. एक वह दर्द जिसे एनजाइना कहते हैं और दूसरा वह जिसे हार्ट अटैक या मायोकार्डियल इन्फार्कशन कहते हैं. दोनों ही दिल के दर्द हैं पर दोनों का अंतर समझने के लिए आपको दिल तक खून पहुंचाने वाली रक्त नलिकाओं को जानना होगा.
दिल की तीन मुख्य नलियां होती हैं - दो दिल के बाएं तरफ और एक दिल के दाएं तरफ. इन्हें हम कोरोनरी आर्टरीज कहते हैं - राइट कोरोनरी आर्टरी और लेफ्ट कोरोनरी आर्टरी. बढ़ती उम्र तथा अन्य कई कारणों से इन रक्त नलिकाओं में अंदर धीरे-धीरे रुकावट पैदा होने लगती है. इनमें कोलेस्ट्रॉल जमने लगता है. नली सिकुड़ने लगती है. रक्त का प्रवाह कम होता जाता है. जब रक्त का प्रवाह एक निश्चित सीमा से भी कम हो जाता है, मान लें कि कोई नली 70% से ज्यादा बंद हो गई है तो आराम से बैठने पर तो कभी कोई तकलीफ नहीं होती परंतु हल्की सी मेहनत करने पर ही (पैदल चलने पर, खासकर कोई चढ़ाई चढ़ने पर या सीढ़ियां चढ़ने पर, वजन लेकर चलने पर) आदमी को दिल में दर्द महसूस होता है.

यह दर्द तेज नहीं होता, छाती में एक असहजता का अहसास या छाती में हल्का सा भारीपन या भरा-भरा सा लगता है. यह केवल पैदल चलने पर ही लगता है और जैसे ही रुकते हैं वैसे ही कुछ देर में यह एहसास खत्म भी हो जाता है. इसे एंजाइना कहा जाता है. यह हार्ट अटैक नहीं है. यह तो शरीर की तरफ से एक चेतावनी है कि भविष्य में कभी जब यह नली पूरी बंद हो जाएगी तो आपको हार्ट अटैक हो सकता है. यदि इस चेतावनी को समझ लिया जाए और इसका बराबर इलाज हो जाए तो आदमी हार्ट अटैक से बच जाता है. कभी-कभी आदमी की कोरोनरी नलिकायें बिना एंजाइना के सीधे ही पूरी बंद हो सकती हैं. तब सीधे ही हार्ट अटैक हो जाता है.
हार्ट अटैक का छाती का दर्द एकदम अलग किस्म का होता है जो एनजाइना से पूरी तरह अलग है. एंजाइना तो केवल मेहनत करने पर ही होता है. यह बैठे-बैठे नहीं होता. इधर हार्ट अटैक का दर्द अचानक ही कभी बैठे हुए भी हो सकता है. यह प्रायः बहुत तेज होगा, छाती के मध्य में होगा, पर यह ऐसा दर्द होगा जिसे आप एक जगह पिन पॉइंट नहीं कर सकेंगे. यह ऐसा तेज दर्द होगा जैसे छाती पर कोई भारी चट्टान रख दी गई हो. एक बोझ का एहसास या छाती के फटने की फीलिंग और साथ में दम सा घुटने का एहसास भी. साथ-साथ यह अहसास कि मानो जान ही जा रही हो. ऐसे दर्द के साथ प्रायः बहुत ज्यादा ठंडा पसीना आयेगा. यदि यह सब हो तो मानिए कि यह हार्ट अटैक का दर्द है.
वैसे, यह दर्द छाती के साथ-साथ प्रायः बाएं हाथ में भी महसूस हो सकता है. बांह जैसे फटने सी लगती है, खासकर अंदर की तरफ की बांह का हिस्सा. पर याद रहे कि यह दर्द बाईं की जगह दाहिनी बांह में भी हो सकता है, कंधे में आ सकता है, पीछे पीठ की तरफ जा सकता है, गर्दन में या दोनों जबड़ों में भी जा सकता है, या कभी-कभी तो यह कमर तक भी जा सकता है. तो ऐसा कोई भी छाती का दर्द जो भारीपन जैसा हो और जिस में बहुत पसीना आ रहा हो वह हार्ट अटैक का दर्द हो सकता है. और ऐसा दर्द यदि किसी डायबिटिक, ब्लड प्रेशर, मोटे आदमी, तंबाकू लेने वाले आदमी या ऐसे आदमी जिसके परिवार में कम उम्र में हार्ट अटैक हुआ हो - इनमें से किसी को भी हो, तब तो ऐसे दर्द के हार्ट अटैक होने की संभावना बहुत बढ़ जाती है.
यहां इस मामले में एक पेंच हैं जिससे कई बार डॉक्टर भी ऐसे हार्ट अटैक को ठीक से नहीं समझ पाते और गलती कर देते हैं. पेंच यह कि यदि मरीज को डायबिटीज है तो कई बार हार्ट अटैक में कोई दर्द या तो होता ही नहीं या फिर बहुत हल्का होता है, या फिर दर्द न होकर कुछ और ही तरह के लक्षण पेश आते हैं. इससे भ्रम हो जाता है. कई अजीब से लक्षण हो सकते हैं. जैसे आधे घंटे से या एक घंटे से कुछ ठीक नहीं लग रहा है, चक्कर से लग रहे हैं, आंखों के सामने अंधेरा सा आ रहा है, बिना किसी कारण के थकान बहुत लग रही है, जरा सा चलने भारी थकान हो जा रही है. यह मान लें कि यदि एक डायबिटिक मरीज को कोई भी ऐसी नई तकलीफ अचानक ही हो जाये जो बस कुछ देर से ही हो रही हो, जो पहले कभी नहीं थी तब या तो उसकी शुगर कम हो रही है या फिर यह दर्द के बिना भी हार्ट अटैक हो सकता है.
वैसे और लोगों को भी बहुत तेज दर्द के बिना हार्ट अटैक हो सकता है या बहुत हल्के दर्द के साथ भी हार्ट अटैक हो सकता है और कई बार दर्द छाती में ना होकर केवल बाहों में, केवल कंधे में, केवल जबड़े या गर्दन में, या केवल पेट के ऊपरी हिस्से में हो सकता है. पेट के मामले में मरीज को लगता है कि आज गैस बहुत बन रही है, पेट फूला जा रहा है जैसा उसका कभी पहले फूला ही नहीं.
ये सब हार्ट अटैक के असामान्य प्रेजेंटेशन हैं जो आमतौर पर नहीं होते पर किसी-किसी में कुछ अलग हटकर भी हार्ट अटैक हो सकता है.वैसे ऐसा कम होता है. जब होता है तो डॉक्टरों से भी ऐसे में डायग्नोसिस कई बार मिस हो सकती है. पर ऐसे किसी दर्द को कतई नजरअंदाज ना करें क्योंकि हार्ट अटैक में एक-एक मिनट कीमती होता है. यदि कभी ऐसा कोई भी दर्द आपको भी हो तो देर मत कीजिएगा, एक एस्प्रिन लेकर तुरंत अस्पताल जाइएगा.

अगवा किशोरी के साथ सामूहिक बलात्कार;जौनपुर पुलिस आरोपियों की तलाश मे

उत्तर प्रदेश के जौनपुर जिले में एक किशोरी को अगवा कर उसके साथ सामूहिक बलात्कार किए जाने का मामला प्रकाश में आया है. पुलिस ने मामला दर्ज कर लिया है. हालांकि अभी तक पुलिस के हाथ आरोपी व्यक्तियों का कोई सुराग नहीं लग पाया है.
यह शर्मनाक वारदात जौनपुर के सरपतहां थाना क्षेत्र की है. एक स्थानीय पुलिस अधिकारी ने जानकारी देते हुए बताया कि पीड़िता इंटर की छात्रा है. वह अपनी नानी के घर आई थी. रात को कुछ लोग जीप में सवार होकर आये और उसे अगवा कर अपने साथ ले गये. स्पष्ट है कि यह सुनियोजित था.
किशोरी ने पुलिस को बताया कि गांव में ही नहर के पास ले जाकर चार लोगों ने उसके साथ बलात्कार किया. घटना के बाद किशोरी आरोपियों के चंगुल से किसी तरह छूटकर एक घर में जाकर घुस गई और वहां मौजूद लोगों को उसने आपबीती सुनाई.
तब इस बात की सूचना पुलिस तक पहुंची. किशोरी को अस्पताल में दाखिल कराया गया है. पुलिस के अनुसार मामले की छानबीन की जा रही है. घटना को गंभीरता से लेते हुए स्थानीय पुलिस खोजी कुत्तों की मदद से आरोपियों की तलाश कर रही है.
इस बीच पुलिस अधीक्षक के.के. चौधरी ने बताया कि पीड़िता के परिजनों ने घटना की तहरीर दी है, परंतु सामूहिक दुष्कर्म का कोई जिक्र उसमें नहीं है. तहरीर में अगवा करने का मामला बताया गया है. मामले की जांच चल रही है और दोषियों को शीघ्र गिरफ्तार कर लिया जायेगा.


रघुराम राजन ‘सख्त’ थे, तो मौजूदा गवर्नर उनसे अलग कैसे हैं?

अपनी सख्त मौद्रिक नीति से महंगाई थामने की भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) की कोशिश लगातार रंग दिखा रही है. पिछले हफ्ते घोषित आंकड़ों के अनुसार सितंबर में खुदरा महंगाई दर को बताने वाले सूचकांक यानी सीपीआई में केवल 3.28 फीसदी की वृद्धि हुई. इससे वित्त वर्ष 2017-18 की पहली छमाही (अप्रैल से सितंबर) में खुदरा महंगाई की औसत दर केवल 2.6 फीसदी रही. यह खुदरा महंगाई पर आरबीआई के अनुमान (दो से 3.5 फीसदी) की अधिकतम सीमा से करीब एक फीसदी कम है.
इसके पीछे  का अतीत देखे तो सख्त गवर्नर की छवि वाले रघुराम राजन ने जनवरी 2015 से अप्रैल 2016 के बीच केवल 15 महीनों में इन दरों में क्रमश: 1.5 और एक फीसदी की कमी की थी. 
यह हैरान करने वाली बात है कि जो आलोचक राजन की मौद्रिक नीति की आलोचना करते नहीं थकते थे, उनकी निगाह से उर्जित पटेल की नीति पर कैसे अभीतक परीक्षण नहीं हुआ है? विचारणीय विषय है. 

कई आलोचक इसका श्रेय आरबीआई गवर्नर उर्जित पटेल की सख्तमौद्रिक नीति को दे रहे हैं. लेकिन यह उन्हें गवर्नर बनाए जाते वक्त (सितंबर 2016) उनसे लगाई गई उम्मीदों के विपरीत है. तब सरकार को उनसे उम्मीद थी कि वे मौद्रिक नीति को नरम करेंगे जिससे सस्ती दर पर कर्ज मिल सके. लेकिन पिछले तेरह महीनों में उन्होंने रेपो और रिवर्स रेपो दरों में केवल आधा और चौथाई फीसदी की कमी की है.

आल अलाइ फाउण्डेशन की दीपावली गरीब बच्चो के साथ

ऑल अलाइ  फाउण्डेशन  ने आज  शकुंतला मिश्रा  विश्व विद्यालय लखनऊ  स्थानीय  गरीब बच्चो  को  दीपावली  के अवसर पर मिठाई  का वितरण किया। यह सब स्थानीय  गरीब  बच्चे।  इस  कार्य  में तमाम प्रोफेसर व अन्य  लोगो द्वारा  सहयोग धनराशि  चंदे के रूप  में  दी  गई थी। 
इस कार्यक्रम के  मुख्य आकर्षण थे  -- इन  बच्चो  को दैनिक प्रयोग  की सामग्री मंजन ,ब्रश ,सबुन, दिये  आदि  वितरण किया  जाना । इस  कार्यक्रम  को सिर्फ  उन लोगो  को समर्पित किया गया था जो मजदूरी आदि से अपना भरण पोषण  करते है।अब्दुल्ला चौधरी व् अन्य इस कार्यक्रम में शामिल हुए।  
इस कार्यक्रम  में अंग्रेजी  साप्ताहिक अख़बार 'दी बंट लाइन' के  संपादक क्षितिज कांत भी शामिल होकर इन सामग्री के वितरण में सहयोग दिया।   

साम्प्रदायिक बवाल, पथराव और आगजनी के बीच यूपी का बलिया

यूपी के बलिया जिले के रतसड़ कस्बे में दो बुधवार को दो समुदाय आमने-सामने आ गए। इस दौरान जमकर पथराव और आगजनी हुई। दर्जनों दुकानों में तोड़फोड़ की गयीं और दो घरों में आग लगा दिया गया। सूचना मिलते ही कई थानों की फोर्स लगाकर हालात को काबू में किया गया। जिलाधिकारी सुरेन्द्र विक्रम सिंह ने कहा है कि अब हालात सामान्य हैं। लापरवाही बरतने के आरोप में चौकी इंचार्ज को निलंबित कर दिया गया है। इस मामले में अब तक 20 लोगों को गिरफ्तार किया गया है, दो लोगों पर रासुका और गैंगस्टर के तहत कार्रवाई की जा रही है। बता दें कि महज 10 दिनों में यह दूसरा मामला है जब बलिया जिले में दो समुदायों के बीच बवाल हुआ है। पुलिस के मुताबिक अब इलाके में शांति बनी हुई है पर गांव में तनाव की बात कही जा रही है बताया गया है कि बलिया जिले के गड़वार थानाक्षेत्र के रतसड़ कस्बे में बुधवार को हुए बवाल की शरुआत एक दिन पहले हुई मामूली घटना से हुई। रतसड़ में मंगलवार को बाइक व साइकिल की टक्कर के बाद दोनों पक्षों की ओर से मारपीट हुई थी। सूचना मिलने पर पहुंची पुलिस ने दोनों पक्षों को थाने बुलाकर समझा बुझा दिया। इसके बाद दोनों पक्ष फिर भिड़ गए। इसमें घायल युवक को तत्काल पहले नजदीक के अस्पताल भेजा गया। वहां से उसे जिला अस्पताल के लिये रेफर कर दिया गया। प्रशासन के मुताबिक इस दौरान किसी तरह ये बात फैल गई कि घायल को अधिक चोटें आयी हैं और उसकी हालत चिंताजनक है। हालांकि दूसरी ओर कुछ लोगों का यह भी कहना है कि अस्पताल में पुलिस केस कहकर इलाज से मना कर देने को लेकर उन लोगों की नाराजगी बढ़ गयी। इसके बाद नाराज लोगों ने कस्बे में सड़क जाम कर दिया। प्रशासन के मुताबिक इसी में से कुछ उपद्रवी लोगों ने तोड़फाड़ किया। दो मकानों में आगजनी की और कई ठेले उलट दिये। इस मामले में 20 लोगों को गिरफ्तार कर लिया गया है। दो विशेष रूप से चिन्हित हुए हैं उन पर एनएसए और गैंग्स्टर लगाया जाएगा।


रिहाईमंच ने रविवार को कहा है कि 10 अक्टूबर को शाम के वक़्त में अरविंद राजभर और रिंकू के बीच साइकिल.मोटरसाइकिल की टक्कर के बाद तनाव बढ़ा और दूसरे दिन गांधी आश्रम चौरहे पर हो रहे धरने से उड़ी अफवाह की हिन्दू युवक की मौत हो गई के बाद मुस्लिम दुकानों.मकानों पर हमला, लूट.पाट और आगजनी की गई। दंगाइयों ने डॉ मोहम्मद बिस्मिल्लाह के क्लिनिक पर भी हमला किया।
‌रतसर की ठठेरी गली, सदर बाजार, पकड़ी तर के तीन मकान.दुकान समेत दसियों दुकानों को पूरी तरह से लूट के बाद आतताइयों ने तहस.नहस कर दिया। हिदायततुल्ला खान के दो मंजिला मकान में स्थित पैतृक कपड़े की दुकान और रिहाइश को जहाँ लूटपाट कर आग के हवाले किया वहीं मुहम्मद शमीम के सीमा जनरल स्टोर के दो मंजिला होलसेल के गोदाम और स्टोर को भी लूटपाट के बाद आग के हवाले कर दिया। राजू रेडीमेड को भी इसी तरह से खाक कर दिया दंगाइयों ने
गांधी आश्रम चौराहे पर आगे फलों की दुकानों को लूटते हुए सैकड़ों की संख्या में पेट्रोल, लाठी.डंडों, रंभा.लोहे के राड से लैस जुलूस रतसर मुख्य बाजार में प्रवेश करते हुए पहले से चिंहित मुस्लिमों की बड़ी.बड़ी दुकानों निशाना बनाया।
पकड़ी तर पर स्थित दानिश नफीश की कोहिनूर मोबाइल तो उन्हीं के भाई डंपी की सेंट्रल बैंक के पास न्यू कोहिनूर मोबाइल की दुकान को पूरी तरह से लूट लिया। कमाल खान के जिम] नईम अंसारी के हिन्द वॉच] अख्तर नवाज के जनरल स्टोर समेत कई दुकानों पर लूटपाट की।
रिहाई मंच ने दावा किया है कि 20 किलोमीटर दूर सिंकन्दरपुर की आग ठंडी भी नहीं हुई थी कि रतसर को भी साम्प्रदायिक तत्वों ने आग में झोंक दिया। सिंकन्दरपुर में साम्प्रदायिक तत्वों के खिलाफ करवाई न होने के चलते साम्प्रदायिक तत्वों का मनोबल बढ़ा। सत्ता संरक्षण में प्रशासन के उच्च अधिकारियों की मौजूदगी में मुस्लिमों के दुकानों में की गई लूटपाट और आगजनी। पीड़ितों की पुलिस एफआईआर नहीं दर्ज कर रही है।


हरदोई में लड़की को अगवा कर उसके साथ गैंगरेप

हुमा मुबीन: हरदोई  
उत्तर प्रदेश की राजधानी से मात्र 100 किलोमीटर दूर हरदोई के लोनार कोतवाली क्षेत्र में एक लड़की को अगवा कर उसके साथ गैंगरेप किए जाने का सनसनीखेज मामला सामने आया है। इतना ही नहीं दरिंदों ने पीड़िता के साथ हैवानियत की सारी हद पार करते हुए उसके प्राइवेट पार्ट पर नुकीली चीज़ से हमला किया है। पीड़िता की तहरीर पर पुलिस केस दर्ज करके इस मामले की जांच कर रही है।
जानकारी के अनुसार, हरदोई जिले के लोनार कोतवाली क्षेत्र में रहने वाली पीड़िता की मां की अचानक तबियत खराब होने पर पिता उसे अस्पताल ले कर गए थे। इस दौरान घर में पीड़िता अकेली थी, लेकिन जब पीड़िता के परिजन घर वापस आए तो देखा कि उनकी बेटी नहीं है। देर रात तक बेटी के नहीं आने पर पीड़ित परिवार इसकी सूचना लोनार पुलिस को दी।
इसके बाद भी किसी भी तरह की कार्रवाई नहीं होने पर लड़की का पिता सुबह तहरीर लेकर थाने गया। वहां पुलिस उन्हें शाम तक थाने में ही बैठाए रखा और बाद में बिना रिपोर्ट दर्ज कर वापस घर भेज दिया। शाम को जब पीड़िता का पिता घर पहुंचा तो पता चला कि लड़की घर आ गई है। उसके बाद पीड़िता ने अपने साथ हुई दरिंदगी की दास्तान परिजनों को बताई।
पीड़िता के मुतातबिक, वह घर में अकेली थी, तभी दो लोग अकेले का फायदा उठाकर उसे जबरन वाहां से उठा ले गए। उन लोगों ने उसके साथ गैंगरेप किया. दरिन्दों ने लड़की के प्राइवेट पार्ट पर नुकीली चीज से हमला भी किया. चीखने पर पीड़िता के मुंह में कपड़ा ठूंस दिया गया, आंख पर पट्टी और हाथ-पांव बांध कर बांस के झाड़ में फेंक दिया गया। किसी तरह इनके चंगुल से छूटकर घर पहुंची।

पिता ने जब पुलिस को बताया तो उसे ही फर्जी मामले में फंसाने की धमकी दे डाली गई। जब युवती की हालत बिगड़ी तो उसे महिला अस्पताल में भर्ती कराया गया। इसके बाद महिला थाने में पीड़िता के पिता द्वारा दी गई तहरीर पर गांव के ही उदयभान और नन्हे के खिलाफ नामजद केस दर्ज किया गया है। पुलिस इस मामले की जांच में जुट गई है।

इलाहाबाद केन्द्रीय विश्वविद्यालय छात्रसंघ चुनाव में समाजवादी छात्र सभा का वर्चस्व कायम



अवनीश कुमार यादव अध्यक्ष इलाहाबाद केन्द्रीय विश्वविद्यालय


इलाहाबाद केन्द्रीय विश्वविद्यालय छात्रसंघ चुनाव में चार पर समाजवादी छात्र सभा व एक पद पर एबीवीपी का कब्जा हुआ है। इस चुनाव के परिणम बड़े अप्रत्याशित है। अध्यक्ष -अवनीश कुमार यादव ( समाजवादी छात्र सभा) उपाध्यक्ष - चंदशेखर चौधरी (समाजवादी छात्र सभा) महामंत्री - निर्भय कुमार द्विवेदी(एबीवीपी)  संयुक्त सचिव - भरत सिंह (समाजवादी छात्र सभा) सांस्कृतिक सचिव - अवधेश कुमार पटेल (समाजवादी छात्र सभा) इस चुनाव के दौरान जहां एबीवीपी के चुनावी प्रत्याशी ध्राशयी हुए हैं वहां पर मात्र एबीवीपी के महामंत्री पद के प्रत्याशी ही अपनी सीट बचान मे सफल हुए है। अन्य सभी सीटों पर समाजवादी छा़़त्रसभा ने अपना वर्चस्व कायम रखा है।

हिमाचल प्रदेश में आचार संहिता तो लागू -- गुजरात में नहीं: आश्चर्यजनक! सीपीएम ने कहा

गुजरात चुनाव को लेकर चुनाव आयोग फिलहाल राजनीतिक दलों के निशाने पर घिरा हुआ है. साल के आखिर तक देश के दो राज्यों में विधानसभा चुनाव होने हैं. गुजरात और हिमाचल प्रदेश में. निर्वाचन आयोग ने गुरुवार को चुनाव की तारीखें घोषित कीं, किन्तु यह सिर्फ हिमाचल प्रदेश के लिए है।
 गुजरात विधानसभा चुनाव की तारीखें घोषित नहीं की गईं. चुनाव आयोग के इस कदम से सभी राजनीतिक पार्टियां अब चुनाव आयोग पर सवाल उठाने लगी हैं और इन पार्टीयों का आरोप हैं कि चुनाव आयोग भेदभाव कर रहा है।
 वामपंथी दल कम्यूनिष्ट पार्टी(मार्क्स) ने बयान जारी कर चुनाव आयोग पर सवाल उठाएं हैं।  सीपीएम पोलित ब्यूरो ने कहा कि, "यह तो और भी आश्चर्यजनक है, क्योंकि गुजरात में चुनाव अगर 18 दिसंबर तक पूरे होने हैं तो गुजरात में भी आचार संहिता लग जानी चाहिए।"
 यह आश्चर्य करने वाली बात है कि चुनाव आयोग ने हिमाचल प्रदेश विधानसभा चुनाव के लिए तारीखों का ऐलान तो कर दिया, लेकिन गुजरात में होने वाले विधानसभा चुनाव की तारीख टाल दी।
उन्होंने कहा, "सामान्यता अगर किन्हीं दो राज्यों में विधानसभा चुनाव छह महीनों के भीतर तय हों तो उन राज्यों में चुनाव की तारीख की घोषणा एक साथ होती है और दोनों राज्यों में एकसाथ आचार संहिता एक ही दिन से लागू होती है। अब तक ऐसा ही होता आया है. हिमाचल प्रदेश में आचार संहिता तो लागू हो गई है, लेकिन गुजरात में स्थिति ऐसी नहीं है और गुजरात में आचार संहिता लागू नहीं की गई।"


सनातन आश्रम में ३ दिवसीय पत्रकार-संपादक अधिवेशन का समापन

इस सप्ताह 

विगत 70 वर्षों में समाचारपत्रों एवं अन्य प्रसारमाध्यमों के माध्यम से हिन्दुत्व के विरोध में बडा षडयंत्र रचा गया। हमारे लिए उसके जड़ तक जाना अत्यंत आवश्यक है ! शिक्षा व्यवस्था एवं समाचारपत्रों के माध्यम से अयोग्यकृत्यों को योग्यदिखाया गया। हिन्दू समाज शक्ति वीरता, सदाचार, एवं त्याग में अग्रसर होते हुए भी वर्तमान स्थिति में बौद्धिक स्तर पर हिन्दू असफल सिद्ध हुए हैं ! अतः विद्यालयों में भगवद्गीता के कुछ श्‍लोक सिखाने जैसे उपरी प्रयास करते समय ही विविध स्थानों पर उच्चविद्या केंद्रों की स्थापना होनी चाहिए। पत्रकारों को भी विद्या की साधना कर समाज के सामने सच्चाई रखनी चाहिए। भारत सरकार के पूर्व सांस्कृतिक सलाहकार तथा भोपाल स्थित धर्मपाल शोधपीठ के संस्थापक प्रा. रामेश्‍वर मिश्र ने ऐसा प्रतिपादित किया। पत्रकार-संपादक प्रथम अधिवेशनके समापन सत्र में वे ऐसा बोल रहे थे।
यहां के सनातन आश्रम में ३ दिवसीय पत्रकार-संपादक अधिवेशन का समापन हुआ। इस अवसर पर व्यासपीठपर हिन्दू जनजागृति समिति के राष्ट्रीय प्रवक्ता श्री. रमेश शिंदे एवं समिति के महाराष्ट्र प्रवक्ता श्री. अरविंद पानसरे उपस्थित थे। अधिवेशन के समापन के समय अधिवेशन में सहभागी पत्रकार एवं संपादकों ने अपने अनुभवों का कथन किया।
प्रा. मिश्र ने आगे कहा कि, भारत में हिन्दुओं के विरोध में जाने का किसी में साहस न हो; इसके लिए जो सत्ता में हैं, उन पर पत्रकारों को दबाव रखना चाहिए ! हिन्दुत्व व्यापक है; इसलिए हिन्दुत्व का कार्य करनेवाले सभी संघटनों को संघटित रूप से विविध क्षेत्रों में कार्य करते रहना चाहिए !
श्री. अरविंद पानसरे ने कहा कि, इस पत्रकार-संपादक अधिवेशन के माध्यम से हिन्दुत्वनिष्ठ पत्रकारिता को एक व्यापक स्वरूप प्राप्त हो रहा है। अधिवेशन में उपस्थित पत्रकारों की संघटितता से यह ध्यान में आता है कि, इसके आगे पत्रकारों का हिन्दुत्व का कार्य किसी क्षेत्र तक सीमित न रहते हुए, उसकी व्यापकता बढेगी ! इस माध्यम से सभी को संघटित रूप से हिन्दुत्व का कार्य करने का अवसर मिला है !
हिन्दू जनजागृति समिति के राष्ट्रीय प्रवक्ता श्री. रमेश शिंदे ने अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि, वास्तव में जो घटित है, उसको समाज के सामने न रखते हुए समाचारपत्र के स्वामी को जो अपेक्षित है, उसको समाचारपत्र में रखा जाता है, यही वर्तमान पत्रकारिता की दुःस्थिति है !
महाभारत के समय जब धृतराष्ट्र के पुत्र मारे जा रहे थे, तब भी संजय ने धृतराष्ट्र तक उसका सत्य समाचार पहुंचाया। हिन्दू राष्ट्र की स्थापना हेतु पत्रकारों को भी संजय की भांति सत्यनिष्ठ रहना चाहिए। ऐसा करने से ही सत्ता एवं समाज जागृत होंगे ! पत्रकारों ने वैचारिक स्तर के क्षत्रिय बन कर हिन्दूविरोधी विचारों के विरोध में लडना आवश्यक है !

आर्थिक सलाहकार परिषद की पहली बैठक आज

देश की अर्थव्यवस्था को लेकर अभी तो हर तरफ नकारात्मक संकेत ही मिल रहे हैं. अभी मंगलवार को ही अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) ने भी 2017 में भारतीय अर्थव्यव्था की वृद्धि दर का अनुमान घटाकर 6.7 फीसदी कर दिया है. इसके लिए उसने नोटबंदी जैसे दुस्साहसिक कदम और वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) को ज़िम्मेदार बताया है. इसी बीच ख़बर आई है कि प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद (ईएसी-पीएम) की बुधवार को पहली बैठक हो रही है. ऐसे में यह सवाल लाज़मी ही है कि क्या ईएसी-पीएम अर्थव्यवस्था को गति देने के लिए कोई बड़ा फैसला करेगी.
द इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक बीती 25 सितंबर को ही गठित की गई ईएसी-पीएम की पहली बैठक की अध्यक्षता नीति आयोग के सदस्य बिबेक देबरॉय करेंगे. इस बैठक में केंद्रीय वित्त मंत्रालय के आर्थिक सलाहकार अरविंद सुब्रमणियन अर्थव्यवस्था के मौज़ूदा हालात पर एक प्रेजेंटेशन देंगे. इसमें आर्थिक तरक्की की रफ्तार बढ़ाने और रोजगार के नए अवसरों के सृजन जैसे मुद्दों पर तात्कालिक हस्तक्षेप की ज़रूरत पर बल दिया जाएगा.
सूत्रों की मानें तो इस बैठक में ईएसी प्रधानमंत्री को कोई बड़ा मशविरा शायद ही दे. अलबत्ता वह कौशल विकास, व्यापार-वाणिज्य, डिजिटल इकॉनॉमी, मूलभूत ढांचा, कृषि, नवाचारयुक्त पारिस्थितिक तंत्र आदि क्षेत्रों को चिन्हित कर सकती है, जहां तुरंत नीतिगत हस्तक्षेप और मशविरे की ज़रूरत है. इसके अलावा अर्थव्यवस्था की समयबद्ध निगरानी के लिए एक तंत्र विकसित करने के बारे में भी विचार-विमर्श किया जा सकता है.
इस ख़बर के बीच यहां एक और बात ग़ौर करने लायक यह है कि आईएमएफ ने जहां भारतीय अर्थव्यवस्था की वृद्धि दर को घटाया है वहीं चीन के आर्थिक विकास का अनुमान बढ़ाया भी है. आईएमएफ ने अनुमान जताया है कि चीन की आर्थिक वृद्धि दर 2017 में 6.8 फीसदी रह सकती है जबकि पहले संगठन ने यह आंकड़ा 6.7 प्रतिशत बताया था.
हालांकि भारत और चीन के इन अनुमानों के बीच दोनों देशों से संबंधित एक विरोधाभासी तथ्य भी इसी संगठन ने सामने रखा है. इसके मुताबिक चीन ने बढ़ते वैश्विक कर्ज़ की समस्या को नहीं संभाला तो उसकी अर्थव्यवस्था के लिए जोखिम रहेगा. वहीं भारत के संदर्भ में आईएमएफ का मानना है कि नरेंद्र मोदी सरकार ने आर्थिक मोर्चें पर जो ढांचागत सुधार किए हैं उससे देश की अर्थव्यवस्था जल्दी ही पटरी पर लौटेगी और वह आठ फीसदी की वृद्धि दर भी हासिल कर सकती है

ऑस्ट्रिया में बुर्के और नकाब पर प्रतिबंध




ऑस्ट्रिया में सार्वजनिक जगहों पर पूरी तरह से चेहरे को ढकनेवाले नकाब पर प्रतिबंध से संबंधित कानून रविवार से प्रभावी हो गया । इस तरह अब महिलाएं सार्वजनिक जगहों पर नकाब नहीं पहन सकेंगी ! सरकार के अनुसार, कानून में कहा गया है कि, माथे से ठोड़ी तक का चेहरा जरूर दिखना चाहिए, यह ऑस्ट्रियाई मूल्यों की सुरक्षा के लिए है । यह कानून इस महीने के अंत में होनेवाले आम चुनाव से पहले लागू किया गया है और माना जा रहा है कि, इससे धुर दक्षिणपंथी फ्रीडम पार्टी को लाभ पहुंच सकता है !

मुस्लिम समूहों ने इस कानून की आलोचना की है । मुस्लिम समूहों ने कहा है कि, केवल १५० ऑस्ट्रियाई मुस्लिम महिलाएं पूरे चेहरे का बुर्का पहनती हैं । कानून मुस्लिमों के परदे बुर्का या नकाब पर प्रतिबंध लगाता है, परंतु साथ ही यह मेडिकल फेस मास्क व जोकरों के मेकअप पर भी प्रतिबंध लगाता है । फ्रांस व बेल्जियम ने बुर्का पर प्रतिबंध २०११ में लागू किया था और इसी तरह का कदम नीदरलैंड (डच) की संसद उठाने जा रही है !

जर्मन चांसलर एंजेला मर्केल ने कहा है कि, जहां तक कानूनी रूप से संभव हो सके जर्मनी में पूरी तरह से चेहरे को ढकनेवाले नकाब पर प्रतिबंध लागाया जाना चाहिए । हांलाकि ब्रिटेन में नकाब या बुर्का पर कोई पाबंदी नहीं है । ध्यान रहे कि, पूरे चेहरे के नकाब या बुर्के पर प्रतिबंध को लेकर पिछले काफी समय से खबरें अलग-अलग देशों से आ रही हैं । कुछ दिनों पहले ऑस्ट्रेलिया में एक सीनेटर बुर्के पर प्रतिबंध लगाने की मांग की अपनी मुहिम के मद्देनजर संसद में बुर्का पहनकर आयी थी !

पाउलिन हैंसन नाम की इस सांसद के इस कदम की ऑस्ट्रेलियाई सांसदों ने कड़ी निंदा की थी । कथित तौर पर मुस्लिम विरोधी, प्रवासी विरोधी और और घोर-राष्ट्रवादी ‘वन नेशन पार्टी’ की नेता हैंसन ने दस मिनट से ज्यादा समय के लिए सिर से लेकर टखने तक काले रंग का बुर्का पहना था । उन्होंने इस पर सफाई देते हुए कहा था कि वह चाहती हैं कि राष्ट्रीय सुरक्षा के आधार पर ऐसे लिबास पहनने पर रोक लगाई जाए !

मान्यवर कांशी राम जी से जुड़ी यादे

 बहुजन कलम् से

 बहुजन नायक समाज सुधारक राजनीतिज्ञ व् बहुजन समाज पार्टी के संस्थापक मान्यवर कांशी राम जी से मेरी पहली मुलाकात फरवरी 1988 में लोक निर्माण बिभाग बाराबंकी के अतिथि गृह में हुई थी । जब वह डी ए बी कालेज में बसपा की जनसभा को सम्बोधित करने के लिए आये थे।
जहाँ तक मुझे याद है कि मान्यवार कांशीराम जी प्रातः 10 बजे ट्रेन से बाराबंकी रेलवे स्टेशन पर आये थे और उन्हें एम्बेसडर कार से अतिथि गृह लाया गया था ।जहाँ लगभग तीन घण्टे बिश्राम करने के बाद सभा मंच पर गये थे।

इससे पहले मुझे उनके साथ जलपान करने का मौका मिला । इस दौरान तत्कालीन बसपा जिला अध्यक्ष सन्तदीन पटेल दादा सरदार बेन्त सिंह , नकी हैदर के अतिरिक्त बसपा के युवा साथी बिजय गौतम, सुरेश चन्द्र गौतम विशेष रूप से मौजूद थे । 
मान्यवार हिन्दी मिक्स पंजाबी में अपने बिचार साझा कर रहे थे । उनमें बहुजन समाज को जगाने की ललक झलक रही थी ।
1989 में मान्यवर ने समाज को जगाने को लेकर प्रचार यात्रा शुरू की ।इस यात्रा के दौरान उन्होंने ने सिंचाई विभाग के अतिथि गृह में रात्रि विश्राम किया । बतौर पत्रकार मुझे उनके साथ सफ़दर गंज तक जाने का मौका मिला । सफ़दर गंज चौराहे पर नेता श्याम लाल यादव जी द्वारा सभा आयोजित की गयी थी । सभा सम्बोधित करने के बाद मान्यवर फैज़ाबाद के लिए रवाना हो गए थे । मै टैम्पो से बाराबंकी वापस चला आया ।
इस दौरान जिन मुद्दों पर मान्यवर बेबाकी से बोल रहे थे वह उस समय मेरी समझ से परे थे लेकिन आगे चलकर उनके बिचार समाज को जोड़ने में मील के पत्थर साबित हुए। उनकी सोच और बिचार आज भी दलित समाज को जगाने में सार्थक साबित हो रहे हैं।
9 अक्टूबर 2006 को मान्यवर कांशी राम जी अपने मिशन को अधूरा छोड़ कर हम सब के बीच नही रहे ।
मै आप मित्रों की ओर से मान्यवर कांशी राम जी का शत् शत् नमन बन्दन करते हुए भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित करता हूँ ।हरि प्रसाद वर्मा, पत्रकार 

जब हमारे एक नायक को विदेशी फिल्म फेस्टिवल में सर्वश्रेष्ठ ‘नायिका’ का पुरस्कार मिला!


निर्मल पांडे को आप आज भी नहीं भूले होंगे. बेवक्त जिसे वक्त ने लील लिया (1962-2010) उस अभिनेता ने हिंदी फिल्मों में स्टीरियोटाइप्ड होने के साथ ही ‘बैंडिट क्वीन’, ‘ट्रेन टू पाकिस्तान’, ‘इस रात की सुबह नहीं’ और ‘दायरा’ जैसी बेहतरीन फिल्मों में काम किया था. सुधीर मिश्रा की ‘इस रात की सुबह नहीं’ तो एक कल्ट फिल्म मानी जाती है और ट्रीटमेंट की वजह से अपने वक्त से मीलों आगे की वह फिल्म भी जिसे आज भी सराहने वालों की कमी नहीं.
इन्हीं निर्मल पांडे के नाम पर एक अनोखा रिकार्ड दर्ज है जो हिंदी फिल्मों के किसी भी और नायक का कभी हो न सका. 2007 में ‘दायरा’ नामक एक फिल्म के लिए उन्हें फ्रांस स्थित वेनोसिएन फिल्म फेस्टिवल में सर्वश्रेष्ठ ‘अभिनेत्री’ का पुरस्कार मिला था! सर्वश्रेष्ठ नायिका का कोई देसी खिताब तो ‘चाची 420’ में कमल हासन तक को नसीब नहीं हुआ लेकिन औरतों के संघर्ष पर बनी अमोल पालेकर की बेहद संवेदनशील और बेहतरीन ‘दायरा’ (1997) वह फिल्म रही जिसमें आदमी होकर औरत की तरह बन-संवरकर रहने वाले अपने किरदार को अद्भुत तरह से जीवंत करने की वजह से निर्मल पांडे ने न सिर्फ दूर देश का यह अवार्ड जीता बल्कि भारत में भी खूब वाहवाही बटोरी.
निर्मल की ही तरह ‘दायरा’ को भी हिंदुस्तान में खूब वाहवाही मिली. लेकिन जैसा कि चलन में है, उस साल के राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों में ‘दायरा’ को किसी भी पुरस्कार के लायक नहीं समझा गया!

ऐश्वर्या राय के नखरे बड़े महंगे हैं!

राकेश ओमप्रकाश मेहरा द्वारा प्रोड्यूस की जा रही ‘फन्ने खां’ एक बड़े संकट से गुजर रही है! फिल्म में अनिल कपूर, ऐश्वर्या राय और राजकुमार राव की मुख्य भूमिकाएं हैं, और कुछ वक्त पहले सभी को यह बात पसंद आई थी कि इस फिल्म में ऐश्वर्या के अपोजिट राजकुमार राव नायक हैं. बहरहाल, फिल्म के हाल इसलिए बेहाल हैं क्योंकि अनिल कपूर और राजकुमार राव ने तो अपने-अपने हिस्से की शूटिंग अलग-अलग शुरू कर दी है, लेकिन ऐश्वर्या राय ने अपनी पहले ही दिन की शूटिंग कैंसिल करा दी है!
ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि उनके लिए जो कपड़े तैयार करवाए गए थे वो विश्व सुंदरी को पसंद नहीं आए. फिल्म में ऐश एक सिंगर बनी हैं जिनकी स्टाइलिंग अंतरराष्ट्रीय स्तर की पॉप सिंगर बियोंसे को ध्यान में रखकर की गई है. लेकिन मनीष मल्होत्रा के ये कपड़े ऐश को कम स्टाइलिश और ज्यादा भारतीय लगे, इसलिए शूटिंग रोक दी गई और यह अब तब तक शुरू नहीं होगी जब मनीष मल्होत्रा सारे परिधान फिर से ऐश की इच्छा अनुसार सिलवा लेंगे!
क्यों? क्योंकि महाव्यस्त ऐश ने फिल्म के पहले शूटिंग शेड्यूल के लिए मुश्किल से छह-सात अक्टूबर को दो दिनों का वक्त निकाला था, जोकि उनके नखरे उठाने में ही जाया हो गए. अब आठ अक्टूबर को ऐश्वर्या करवाचौथ मनाएंगी और उसके बाद ससुर अमिताभ बच्चन का जन्मदिन सेलिब्रेट करने के लिए सपरिवार लंबी छुट्टियों पर मालदीव चली जाएंगी. लौटकर दिवाली की खुशियों में शरीक होंगी और उसके बाद ही ‘फन्ने खां’ के निर्माता राकेश ओमप्रकाश मेहरा को थोड़ी राहत की सांस आएगी!

‘केंद्र सरकार लोगों के भीतर सुलग रही आग को देखकर डर गई है’



शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे का यह बयान केंद्र सरकार द्वारा वस्तु और सेवा कर (जीएसटी) की दरें घटाए जाने पर आया. उन्होंने कहा, ‘जनता की ताकत के सामने घमंडी से घमंडी शासकों को भी झुकना पड़ता है.’ जीएसटी में कटौती से 15 दिन पहले दिवाली आने के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बयान पर उद्धव ठाकरे ने कहा कि यह कटौती दिवाली का उपहार नहीं है. उन्होंने आगे कहा कि दिवाली पर लोग लक्ष्मी पूजन करते हैं, लेकिन केंद्र ने ज्यादा टैक्स लगाकर उन्हें लूटा है और उनके पास बहुत कम लक्ष्मी छोड़ी है. वहीं, एनडीए गठबंधन से अलग होने के बारे में भाजपा को चेतावनी देने के सवाल पर शिवसेना प्रमुख ने कहा कि वे इस बारे में किसी को चेतावनी नहीं देंगे, बल्कि जब सही लगेगा, फैसला कर लेंगे.