UPBIL/2018/70352

आगे हाथ नहीं फैलाया;जंगल से लकड़ियां काटकर लाती;उनको बेंचती थीं -- चंद्रशेखर आजाद की मां

झांसी बड़ागांव गेट शमशान घाट
पंडित सीताराम तिवारी उत्तर प्रदेश के उन्नाव जिले के बदर गांव के रहने वाले थे। लेकिन भीषण अकाल के चलते वे मध्यप्रदेश के ग्राम भाबरा में जा बसे थे। जी हां 23 जुलाई 1906 को मध्यप्रदेश के भाबरा गांव में ही सीताराम तिवारी और जगरानी देवी के घर एक बच्चा पैदा हुआ था। नाम रखा गया चंद्रशेखर तिवारी। 
चंद्रशेखर आजाद का नाम असल में चंद्रशेखर तिवारी ही था लेकिन बाद में इन्होंने खुद को आजाद घोषित कर दिया था और कभी अंग्रेजों के हाथो ना मरने की कसम खाई थी।
इन्ही का जन्म दिवस आज पूरा भारत चंद्रशेखर आजाद के जन्मदिवस के नाम से मना रहा है। जैसा कि इन्होंने कभी भी अग्रेंजों के हाथों ना मरने की कसम खाई थी वैसा ही इन्होंने किया भी। 27 फरवरी, 1931 को जब इलाहाबाद के एलफ्रेड पार्क में इन्हें अग्रेजों ने घेर लिया था तो काफी देर तक ये अकेले उनका मुकाबला करते रहे लेकिन जब अंत में उनके पास केवल एक गोली बची थी तो उन्होंने खुद को गोली मार ली थी।
आजाद के शहीद होने के खबर उनकी मां को कई महीने बाद मिली थी। वो पहले ही ऐसी दुख की घड़ी से गुजर रही थी उस पर से जब उन्हें यह पता चला कि उनका बेटा नहीं रहा तो वह पूरी तरह टूट गई।  चंद्रशेखर आजाद के शहीद होने के बाद उनकी मां ने कैसे जिदंगी काटी।
बतातें हैं कि चंद्रशेखर ने अपनी फरारी के करीब 5 साल बुंदेलखंड में गुजारे थे। इस दौरान वे ओरछा और झांसी में रहे। ओरछा में सातार नदी के किनारे गुफा के समीप कुटिया बना कर वे डेढ़ साल रहे थे।
फरारी के समय सदाशिव उनके सबसे विश्वसनीय लोगों में से एक थे। आजाद इन्हें अपने साथ मध्यप्रदेश के झाबुआ जिले के भाबरा गांव ले गए थे और अपने पिता सीताराम तिवारी और माता जगरानी देवी से मुलाकात करवाई थी।
सदाशिव आजाद के शहीद होने के बाद भी ब्रिटिश शासन के खिलाफ संघर्ष करते रहे और कई बार जेल गए। देश को अंग्रेजों से आजादी मिलने के बाद वह चंद्रशेखर के माता-पिता का हालचाल पूछने उनके गांव पहुंचे। वहां उन्हें पता चला कि चंद्रशेखर की शहादत के कुछ साल बाद उनके पिता का भी देहांत हो गया था।
आजाद के भाई की मृत्यु भी उनसे पहले ही हो चुकी थी। पिता के देहांत के बाद चंद्रशेखर की मां बेहद गरीबी में जीवन जी रहीं थी। गरीबी के बावजूद उन्होंने कभी किसी के आगे हाथ नहीं फैलाया।
वो जंगल से लकड़ियां काटकर लाती थीं और उनको बेचकर ज्वार-बाजरा खरीदती थी। भूख लगने पर ज्वार-बाजरा का घोल बनाकर पीती थीं। उनकी यह स्थिति देश को आजादी मिलने के 2 साल बाद (1949) तक जारी रही।
आजाद की मां का ये हाल देख सदाशि‍व उन्हें अपने साथ झांसी लेकर आ गए। मार्च 1951 में उनका निधन हो गया। सदाशिव ने खुद झांसी के बड़ागांव गेट के पास शमशान घाट पर उनका अंतिम संस्कार किया था। घाट पर आज भी आजाद की मां जगरानी देवी की स्मारक बनी है।  


केजीएमयू ट्रॉमा सेंटर में भीषण आग: कोई हताहत नहीं

Photo by Pranjal
उत्तर प्रदेश की राजधानी स्थित किंग जॉर्ज मेडिकल विश्वविद्यालय(केजीएमयू) कट्रॉमा सेंटर में शनिवार की शाम भीषण आग लग गई. पहले अफरातफरी मची, फिर भगदड़ जैसे हालात पैदा हो गए. फिलहाल किसी के हताहत होने सूचना नहीं है. मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने राहत और बचाव कार्य युद्ध स्तर पर चलाने के निर्देश दिए.  
 आग ट्रॉमा सेंटर जहां पर उत्तर प्रदेश के विभिन्न जिलो से अत्यंत बिगड़ी हालात के मरीज व उनके परिजन यहां पर प्रतिदिन पर आते है की दूसरी और तीसरी मंजिल पर लगी थी. आग के विकराल रूप को देखते हुए दूसरी, तीसरी और चौथी मंजिल से मरीजों को निकालकर उन्हें दूसरे अस्पतालों में शिफ्ट कराया गया. केजीएमयू के सीएमएस शंखवार ने बताया कि आग दूसरी और तीसरी मंजिल पर लगी थी.
 दमकल की 6 गाडियों की मदद से आग पर काबू पाया जा सका, प्रदेश के स्वास्थ्य मंत्री सिद्धार्थनाथ सिंह ने बताया कि मरीजों को अन्य सरकारी अस्पतालों में शिफ्ट कर दिया गया है. अधिकारियों ने कहा कि आग एयरकंडीशनर में शॉर्ट सर्किट की वजह से लगी और देखते ही देखते पूरे दूसरे तल पर फैल गई.
 मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने आग लगने की घटना का तत्काल संज्ञान लेते हुए मंडलायुक्त को जांच कर तीन दिन में रिपोर्ट देने के निर्देश दिए हैं. योगी ने कहा, श्इस घटना के लिए दोषी व्यक्तियों का उत्तरदायित्व निर्धारित किया जाए, जिससे उनके विरुद्ध कार्रवाई की जा सके. साथ ही, इस प्रकार की घटना की भविष्य में पुनरावृत्ति न हो, इसके लिए भी उचित कदम उठाये जायें तथा संस्तुतियां दी जाएं.श्
 अस्पताल सूत्रों के मुताबिक, सेंटर के ज्यादातर मरीजों को लारी और शताब्दी अस्पताल में शिफ्ट किया गया. इस दौरान मरीजों में चीख पुकार मची रही. परेशानहाल तीमारदार अपने मरीजों को लेकर इधर-उघर भाग रहे थे।-उधर भागते नजर आए.
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15 दिवसीय काला फीता बांध कर्मचारियों द्वारा संयुक्त निदेशक प्रशासन मुद्रण एवं लेखन सामग्री उ0प्र0 का विरोध जारी



चतुर्थ श्रेणी राज्य कर्मचारी संघ राजकीय मुद्रणालय लखनऊ के तत्वाधान में 15 दिवसीय काला फीता बांध कर्मचारियों की कतिपय मांगो को लेकर चतुर्थ श्रेणी कर्मचारियों द्वारा मुद्रण एवं लेखन सामग्री 0प्र0 प्रशासन का विरोध जारी है 
आज बुधवार को कर्मचारियों ने भोजनावकाश के समय एक द्वारसभा पर एकि़त्रत होकर  संयुक्त निदेशक प्रशासन होश मे आओ, संयुक्त निदेशक प्रशासन मुर्दाबाद के नारे लगा रहे थे।
     पी टी एन संवादाता द्वारा पूछे जाने पर दया शंकर दीक्षित नेत्रहीन(संघ के अध्यक्ष) ने बताया कि मुद्रण एवं लेखन सामग्री निदेशालय इलाहाबाद जिन सेवारत मृतक कर्मचारियों के परिजन से नियुक्ति की मांगी गयी राशि पहुँचा देते हैं उनकी नियुक्ति बिना किसी आपत्ति कर दी जाती हैं। किन्तु जिनके पास धन नहीं है की नियुक्ति पर लगातार आपत्तियाँ की जाती है।
        अध्यक्ष ने आगे कहा] स्व0 सुशील कुमार श्रीवास्तव (नेत्रहीन राजकीय मुद्रणालय ऐशबाग लखनऊ में काउण्टर पद पर सेवारत थे जिनकी मृत्यु वर्श 2016 मे हुई थी। सुशील की दो पत्नियाँ पहले ही मर चुकी थी। स्व0 सुशील पैदाइशी नेत्रहीन थे फलस्वरूप नामांकन उनके द्वारा भरते हुए अन्य द्वारा भरा गया। पत्नी का नाम नामांकन मे पुत्री की अंक तालिका मे अन्तर होने के कारण नियुक्ति मे आपत्ति लगा दी गई है। जबकि सुशील कुमार इस विभाग मे सेवारत थे एवं  नमिता का नाम सेवा अभिलेख मे सही है फिर भी नियुक्ति नहीं की जा रही है। जिससे माता पिता विहीन नमिता अनजान लोगों से सहायता की भीख मांग  रही है।
अध्यक्ष ने आगे कहा] मुख्यमंत्री उत्तर प्रदेश प्रमुख सचिव उद्योग प्रकरण मे हस्तक्षेप कर इस गरीब अनाथ लड़की की नियुक्ति तत्काल करायें।
        संघ की मांग माने जाने पर चतुर्थ श्रेणी राज्य कर्मचारी संघ गाँधी प्रतिमा हजरतगंज मे धरना देने के लिये विवश है जिसकी सम्पूर्ण जिम्मेदारी मुद्रण एवं लेखन सामग्री 0प्र0 प्रशासन की होगी।