UPBIL/2018/70352

प्रशासन के छापे से पहलेः मुखबर ने सतर्क किया दलालो को

जिलाधिकारी  रोशन जेकब ए आर टी  ओ बाराबंकी दफ्तर में दलाली की शिकायत पर छापा डालती हुई  
 बाराबंकी,(प्रेसमैन)ःइस सप्ताह जिलाधिकारी व पुलिस अधीक्षक ने एआरटीओ कार्यालय की हो रही शिकायतों का संज्ञान लेते हुए वहॉ छापा मारा, लेकिन प्रशासनिक अमले मे मुखबरी छापे से पहले ही सतर्क कर गयी अर्थात कही कोई चूक रह गयी कि सारे दलाल भागने में कामयाब रहें। एआरटीओ अकेला ऐसा कार्यालय है जिसके बारे में हर कोई जानता है कि देश में जितने भी विभाग है उनमे से एआरटीओ कार्यालय ही अकेला ऐसा विभाग है जहॉ दलाल बकायदा दुकाने सजाकर बैठे रहते है और खुलेआम हजारो रूपये का काम एआरटीओ कार्यालय की मिली भगत से कर रहे है। जितनी दलाली के कसूरवार दलाल है उससे अधिक एआरटीओ विभाग के सेवारत कर्मचारी व अधिकारी है। 
जिलाधिकारी बाराबंकी डा. रोशन जैकब व एसपी वैभव कृष्ण ने एआरटीओ कार्यालय पर अचानक छापा मारा। लेकिन एआटीओ कार्यालय के बाहर दलालो की फौज होने के बावजूद एक भी दलाल जिला व पुलिस प्रशासन के हाथ नही लगा, बल्कि बेकसूर बेगुनाह लोग जो अपना काम करवाने आये थे उन्हे पकड़कर पूरा दिन कोतवाली में मुल्जिमो की तरह बैठाये रखा गया तथा बाद में एआरटीओ की तस्दीक पर उनको यह कहकर छोड़ दिया गया कि उनमे से कोई दलाल नही है। 
इससे यह स्वतः साबित है कि एआरटीओ दलालो को ठीक से पहचानते है। अबतक पुलिस ने एआरटीओ से किसी दलाल की शिनाख्त के लिये कोई जानकारी हासिल नही की  जिससे जिलाधिकारी महोदया का पूरा छापा गीला पटाखा साबित हो रहा है। यह बात सच्चाई है कि दलालो की पूरी फौज आरटीओ दफ्तर के बाहर लर्निग लईसेंस के लिये 800/- धनराशि वसूल करते हैं। 
यह भी सच है कि किसी दलाल की हिम्मत नही कि वह कार्यालय में आसानी से जा कर काम करवा सकें जब तक कार्यालय की पूरी मिलिभगत न हो। कार्यवाही तो जिला प्रशासन कितना संजीदा है भ्रष्टाचार से मुक्ति के लिये एवं वत्रमान सरकार का कितना असर अधिकारियो पर है यह समय के गर्त मे है।
डीएम व एसपी का एआरटीओ कार्यालय लाव लश्कर के साथ पहुॅचना ही उनके मिशन की नाकामी रही। यदि इस कार्य के पूर्व लोकल ईन्टेलीजेन्स की सहायता ली गयी होती तो यह भ्रष्टाचार के विरूद्ध सफल अभियान होता एक भी दलाल भागने में सफल न हो पाताः इसमे संलिप्त सरकारी अमले की मिलीभगत सहसंबंध एवं सारा कसूर दलालो का ही नही है साबित हो जाता, बल्कि लाईसेंस बनवाने, नवीनीकरण करवाने व रजिस्ट्रेशन करवाने, भार क्षमता बढ़वाने अथवा कम करवाने के नाम पर जो मोटी-मोटी रकमे वसूली जा रही है उसपर नकेल कस जाती। दलाली उगाये गये धन का बड़ा हिस्सा कार्यालय के कर्मचारी व अधिकारी डकार जाते है।
आश्चर्य है कि मेडिकल फिटनेस की भी दुकान है जिला प्रशासन के सोचने की बात है कि यदि एआरटीओ कार्यालय पर दलाली नही हो रही है तो कार्यालय के बाहर जो दुकाने खुली है उनको क्या फायदा? जैसा कि कहा जा रहा है कि दुकाने फोटो स्टेट की है तो क्या आरटीओं कार्यालय से इतना फोटो स्टेट का काम निकलता है कि लगभग चार दर्जन लोगो को काम मिला हुआ है?

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