UPBIL/2018/70352

पुलिस कस्टडी मे मौत, चार आरोपी जेल में बंद; चार लोगों को बेकसूर मानने वाले मृतक के परिजन की मौत

उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ के बाहरी इलाके मे एक पुलिस कस्टडी मे मौत का मामला प्रकाश मे आया है। इस मौत के राज को छुपाने के लिये लखनऊ पुलिस मृतक के परिजनो का कोपभाजन करने पर आमादा है। मामला कुछ इस प्रकार है।
कय्यूम, अकील, इरफान, एवं बबलू सभी जेल में बंद लोगों के परिजनों और पड़ोसियों के मुताबिक़ 6-7 अप्रैल की रात कोई सवा बजे इंदिरा नगर के दायरे में शामिल हो चुके चांदन गांव के सुनसान कोने में स्थित कय्यूम के घर चोर घुसा था. आहट से घरवालों की नींद टूट गयी, शोर से पड़ोसी भी जाग गये और वह पकड़ा गया. उसकी थोड़ी बहुत पिटाई हुई और 100 नंबर पर उसके पकड़े जाने की सूचना दे दी गयी.
 पुलिस घटनास्थल पर पहुंची लेकिन उसने पानी-मिट्टी से सने चोर को अपने वाहन में बिठाने से परहेज किया और चोर को गोमती नगर थाना पहुंचाने की जिम्मेदारी कय्यूम और उसके पड़ोसी अकील पर लाद दी. मोटरसाइकिल पर दोनों के बीच चोर बैठा. पड़ोसी होने के नाते दूसरी मोटरसाइकिल से इरफान और बबलू भी साथ हो लिये. रात ढाई बजे तक चारों अपने घर वापस भी लौट आये. यही चारों बाद में आरोपी बना दिये गये. चारों गरीब परिवार से हैं और अपने घरों के मुखिया भी हैं।.
 प्रश्न यह है कि पुलिस ने चोरी के घटना स्थल पर पहुंचने के बाद उस चोर को कस्टडी मे नही लिया न ही थाना ले जाने के लिये किसी पुलिस को शिकायतकर्ता के साथ तैनात किया प्रत्यक्ष दर्शी के मुताबिक पानी-मिटटी से सने होने की बात कही गई दोनो ही स्थितियां स्पष्ट करती है - यदि कथनानुसार 100 नम्बर डायल कर पुलिस बुलायी गयी तो क्या चोर घटना स्थल पर मर चुका था या मृतकचोर को उठाकर निवासी पुलिस आने से पहले कहीं छोडने़ चले गये।
रिहाईमंच के मुताबिक पुलिस कहती है कि उसने चोर को अपने कब्जे में लिया था लेकिन वह उसकी पकड़ से भाग निकला. उसे बहुत खोजा गया लेकिन वह हाथ न आया. दूसरे दिन सुबह तकरोही से सटी मायावती कालोनी के पास लावारिस लाश मिली. 100 नंबर पर इसकी सूचना मिलने पर पुलिस आयी और उसे मेडिकल कालेज ले कर चली गयी. उसे लावारिस घोषित कर दिया गया.

नन्हें पहलवान के मुताबिक़ रात कोई 3.30 बजे पुलिस उनके घर आयी थी और उनसे रमेश लोधी के बारे में पूछताछ की थी. लेकिन यह नहीं बताया कि आखिर इतनी रात में की जा रही पूछताछ के पीछे माजरा क्या है. अगले दिन यानी 7 अप्रैल को कोई 11.30 बजे पुलिस फिर गांव आयी और उनसे मोबाइल पर एक धुंधली सी तसवीर पहचानने को कहा. नन्हें पहलवान और फिर रमेश की मां सताना समेत घर के दूसरे सदस्यों और पड़ोसियों ने भी उस तसवीर को नहीं पहचाना. तो भी पुलिस ने नन्हें पहलवान को पोस्टमार्टम हाउस चल कर लाश की पहचान करने का दबाव बनाया.
नन्हें पहलवान ने लाश को देखते ही उसकी पहचान अपने भतीजे के तौर पर कर दी. इसके साथ ही पुलिस ने रहस्यमयी मुस्तैदी दिखायी और लाश को फ़टाफ़ट फुंकवा कर ही दम लिया. इस बीच सूचना पा कर रमेश की बहन बिंदेश्वरी सीधे भैंसाकुंड पहुंची थी. उसने लाश को गांव ले जाने की ज़िद पकड़ी और पुलिस की इस जल्दबाजी के पीछे किसी साजिश की आशंका भी जतायी. लेकिन उनकी आवाज अनसुनी रहा गयी. पुलिस ने जो चाहा, वही किया. वर्दी का आतंक बहुत भारी होता है.
घरवाले चाहते थे कि शव पहले उनके गांव ले जाया जाये लेकिन पुलिस ने उनकी एक न सुनी. इस बेचारगी का मलाल उनका पीछा नहीं छोड़ रहा था. सदमे के इस आलम में पुलिस की जब तब आमद और अपने साथ खड़े लोगों पर बन रहे उसके दबाव ने उनकी बेचैनी और बढ़ा दी थी.
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यह उल्लेख भी ज़रूरी है कि नन्हें पहलवान ने एसएसपी के घर दस्तक दी और मुख्यमंत्री के जनता दरबार में भी इंसाफ की गोहार लगायी लेकिन इंसाफ मिलने की संभावना का कहीं से कोई सुराग नहीं मिला. राजधानी की इस स्थिति से अंदाज लगाया जा सकता है कि सूबे के दूसरे इलाकों में कानून व्यवस्था की हालत कैसी होगी.     
 नन्हें पहलवान वह लखनऊ के इंदिरा नगर इलाके में बहुत पहले शामिल हो चुके तकरोही गांव के मजरे फतहापुरवा के निवासी थे. उनकी मौत की खबर इसलिए ख़ास है क्योंकि वह उस रमेश लोधी के चाचा थे जिसकी पिछली 7 अप्रैल को पुलिस हिरासत में मौत हुई थी और वही इस मामले के प्रमुख पैरोकार भी थे.
 नन्हें पहलवान की मौत की ख़ास बात यह भी कि उन्होंने उन चार लोगों को बेकसूर माना था जिन्हें पुलिस ने इस मामले के आरोपी के बतौर जेल भिजवा दिया. 
शवदाह के समय मौजूद लोगों ने कुछेक पुलिसवालों को फोन पर किसी को कुछ ऐसा भरोसा दिलाते हुए सुना कि सब ठीक हो जायेगा सर, कि काम पूरा हो गया सर. शव दाह के फ़ौरन बाद पुलिस नन्हें पहलवान को थाने पर पहुंचने का आदेश देकर चलती बनी. थाने में समझौते की बात चल रही थी और उनसे किसी कागज़ पर अंगूठे का निशान लिया जाना था. इस बीच वह दवा लेने बाहर निकले. इस बहाने उन्होंने किसी वकील से संपर्क साधा और उसकी सलाह पर वापस थाने जाने के बजाय सीधे अपने घर चले गये.

इसके बाद पुलिस कैलाश लोधी के पीछे पड़ गयी जो उन्हें थाने से मेडिकल की दूकान तक ले गये थे. पुलिस को लगा कि नन्हें पहलवान के थाना वापस न लौटने के पीछे कैलाश लोधी का दिमाग है. पुलिस ने उन्हें धमकाया, लगातार उनका फोन घनघनाया और रिस्पांस न मिलने पर उनके घर भी धमक गयी. उन्हें डर है कि पुलिस उन्हें कभी भी फंसा सकती है.
  ढेरों सवाल हैं. लोगों का बयान है कि चोर को थाने ले जाया गया था. क्यों न माना जाये कि थाने में उसकी बेरहम पिटाई हुई जिससे वह लाश में बदल गया. खुद को बचाने के लिए पुलिस ने उसकी लाश सड़क किनारे फेंक दी और फिर लावारिस लाश की बरामदगी दिखा दी. तो फिर पुलिस देर रात नन्हें पहलवान के घर रमेश लोधी के बारे में पूछताछ करने क्यों और किस आधार पर गयी थी. अगर लाश लावारिस थी तो उसकी शिनाख्त करने के लिए उन पर इतना जोर क्यों था. शवदाह की जल्दी क्यों थी. लाश को घर ले जाने में पुलिस को क्या और कैसी हिचक थी. गांव स्थित श्मशान में शवदाह क्यों नहीं हो सकता था. यह झूठी बात क्यों फैलायी गयी कि रमेश शादीशुदा था, कि उसकी पत्नी उसकी इन्हीं आदतों के चलते छह माह पहले उसे छोड़ कर जा चुकी थी. जबकि रमेश अविवाहित था और हिंदू समाज में अविवाहित को जलाने की नहीं, दफनाये जाने की परंपरा रही है. तो क्या शवदाह और उसमें जल्दबाजी के पीछे पुलिस की मंशा अपने गुनाहों के सबूत मिटाने की थी. पुलिस किस बात का समझौता कराना चाहती थी और क्यों. नन्हें पहलवान के हमदर्दों के खिलाफ पुलिस ने निशाना क्यों साधा. ऐसा माहौल क्यों बनाया कि लोग चुप रहें, कि इसी में अपनी भलाई समझें.
 मुख्यमंत्री और एसएसपी को भेजी गयी नन्हें पहलवान की अर्जी के मुताबिक़ फ़ौरन कार्रवाई हो और पुलिस की भूमिका की उच्च स्तरीय जांच हो.

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